All language subtitles for Ramayana Rise Of A Legend (2026) HDTS Hindi 1080p AVC AAC 2.0 CineVood

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Original subtitles

भगवान विश्णु सृष्टि के संरक्षक

जो ब्रह्मान में शक्ति का संतुलन बनाय रखते हैं

भगवान ब्रह्मा की सबसे शक्तिशाली रचना थे

अलौकिक देव और अत्याचारी आसुर

तीनों लोकों पर आदिपत्य के लिए

देवों और असुरों में सदियों से युद्ध चला आ रहा था

इस महागाता का आरंब तब होता है जब ये युद्ध अपने अंतिम पढ़ाव पर था

ये युद्ध निर्धारित करने वाला था कि तीनों

लोकों पर कौन राज करेगा

असुरों की सेना का नित्रुत्त कर रही थी राजकुमारी कैप्रसी

और

महाबच्छाली असुर संराम

अशूर विजे

भगवान विष्णु का आशिर्वाद देवराज इंद्र के साथ था

की सहायता से प्राप्त शक्तियों ने इंद्र को और भी शक्तिशालिय बना दिया था

लंका पर अब देवों का राज था और उसे संभालने का दाइत्व कुबेर को सौंपा गया

था तीनों लोगों पर राज करने का सौपन देखने वाले

असुर

अवनिम्न दर्जे का जीवन जी रहे थे

और धर्दी से कोसों नीचे

रसातल में दरिद्रों की तरह जी रहे थे

देव

समझ रहे थे कि युद्ध समाप्त हो चुका है

परन्तु प्रलया भी शेष थी।

शमा करे मा आपके ग्रोध का कारण कारण ये है दशानन कि तुझे संगीत

और शास्त्र के परे कुछ और दिखाई ही नहीं देता

किस

काम का है तेरा रक्त जो अपने कुल के उधार के लिए ना बहे

अपनी आखे खोल दशालन। देख हमारे कुल की क्या दशा हो गई

है।

और

इसके बीचे विश्णू का हाथ है। हमेशा वो देवों का पक्ष लेता है।

जब भी कोई असुर अतिशक्ति शाली हुआ, विश्णू ने आवतार लेकर उसका संघार कर दिया।

तो किसी ने कुछ किया क्यों नहीं?

मैंने किया, एक रिशी के साथ विबाह, ताकि मेरे

बच्चों को असुरों के बल के साथ साथ रिशियों की बुद्धी भी मिले, पर मेरा भाखे

तो देखो, विभीशन अपने पिता की तर शांती प्रिय है, कुंभ करन

और शुर्प नखा म

परन्तु तू दशानन, तेरी रगों में दोनों का रक्त बह रहा है। तुझ में

असुरों का बल भी है, और रिश्यों की बुद्धी भी। एक तू ही

है, जो हमारे कुल की खोई हुई गरिमा को वापस ला सकता है। तेरा भविष्य इस रसातल

में नहीं,

उस राजभवन में

समय आ गया है क्रोध का, प्रतिरोध का, देवों की पराजे का,

विश्णु के विनाश का

कर दो

तपस्या इतनी भीशन, इतनी कथोर थी कि उसने स्रिष्टी के रचायता ब्रह्मा को प्रकट

होने पर विवश कर दिया।

रुको दशनन,

अपनी तपस्या को विराम दो। कहीं इसका

देज स्रिष्टी को बस्म न कर दे।

तीनों लोकों में आज तक किसी ने नहीं की क्योंकि जो वर्दान

मुझे चाहिए प्रभू वो तीनों लोकों में आज तक किसी ने नहीं

मांगा होगा ऐसा क्या चाहिए दशानन

असुरों के उत्तार के लिए

शत्रों के संघार के लिए

और अपने सामराज की विस्तार के लिए मैं मानता हूँ

अमर्ता अमर्ता का

वर्दान उसंभव है दशानन मिद्यू एक शाश्वत सत्य है

तो फिर मेरा अंत कैसे हो

ये तै करने का अधिकार

मुझे दीजिए भगवन मांगू

ना देव मेरा बिनाश कर सके ना

असुर ना गंधर्व मेरा संघार कर सके ना यक्ष ना

दैध्य ना नागा और ना ही कोई मायावे शक्तिया रोगों से मेरा

शरीर उनमुक्त हो प्रकृति मेरे आगे निर्वन हो

स्वयं भगवान भी मेरे आगे दुर्बल हो।

तथास्तु।

तैयार करो

कहीए हाँ वही है

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गर्भ है मुझे तुझ पर दशानन। तूने अपने वचन का पालन

किया। वचन अभी पूरा कहा हुआ है मां। ये तो बस आरंभ

है। आई, प्रजा हमारी राह देख रही

है। अब राजा है तू। अपनी प्रजा से एक राजा की तरह मिल।

आज तक लंका के सिंहासन पर वो बैठा था जो लंका की जूती बनने के भी योग्य नहीं था

परन्तु अब लंका को वो राजा मिला है जिससे अधिक बलवान तीनों लोकों में कोई

नहीं जिससे

अधिक विद्वान तीनों लोकों में कोई नहीं

तीनों लोकों पर राज करेगा राजा दिराज

लंका निपती रावण

कल का सूर्य एक नई लंका देखेगा एक ऐसी लंका

जहाँ एक भी असूर का ना रक्त बहेगा ना आसू

तुम मेंसे कोई भी ना भूका रहेगा

ना लाचार जो मैं खाऊँगा वही तुम खाऊँगी

जैसे मैं रहूँगा

वैसे ही तुम रहोगे अगर मेरा राजभवन सोने का होगा तो तुमारा घर भी सोने

का होगा आज के बाद हम तरेंगे नहीं

तीनों लोग हमारे नाम से धर्राएंगे हम

अत्याचार सहेंगे नहीं सब हमारे आगे शीष छुकाएंगे

हमारा सम्मान जो हमसे छीट लिया गया �

अपने बल से हम वापस ले आएंगे देव लोग,

रुथ्वी लोग, मताल लोग दीनों लोगों में एक ही राज होगा

रावन राज

अपने रक्त और बाहुबल से हम अपना सामराज्य चारों दिशाओं में फैलाईगी।

जहां भी ये अश्व जाएगा वो राज्य हमारा हो जाएगा

मंदोदरी अब मेरी है और मेरा राजकोष भी

जो

सर छुकाएगा वो बच जाएगा जो शस्त्र उठाएगा

वो कट जाएगा

ना यज्य होते ना देवों को शक्तियां प्राप्त होंगी।

खर और दूषण मेरे भाई समान

हैं। अंतिम समय तक साथ दिभाएंगे।

बहन का हाथ दिया है विद्धुचीव अब हमारे परिवार एक और सेना भी एक

इंदर से युद्ध करेंगे इंदर से कैसे युद्ध करेंगे विंदी करेंगे

मारीट

बिंदी है आपसे अपने स्वामी

विश्णु को जाके बोल दे अब

तीनों लोगों का स्वामी रावण है

मैंने रावण की आँखों में विनाश्ट देखा है। तीनों लोग उसके अत्याचार से

त्राही-त्राही कर रहे हैं। यदि उसे रोका नहीं किया तो शृष्टि का अंत

निर्चित है। जब-जब शृष्टि पर

संकट आया है, भगवान विष्णु ने अवतार लेकर उसक

परंग तो भगवान ब्रह्मा के वर्तान ने उसे अजय बना दिया है। उसे परास्थ करना

असंभव है।

तुम बोल रहे हो इंद्र। अपने अंकार में रावण ने

मनुष्यों से अमर्ता नहीं मांगी है।

मुझे लगता

है,

उसकी सोची समझी चाल है रावण यही चाहता है कि प्रभु एक दुर्बल मानव अवतार में

जनम ले ताकि उन्हें सरलता से परास्थ किया जा सके

और

यदि ऐसा हो गया तो अनंत काल तक पृथ्वी पर आंतकार चा

जाएगा

प्रभु के लिला प्रमपार है। निर्भय होकर उनकी शुरण में जाओ।

अन्तता भगवान विष्णू ने पृथ्वी पर अपना सात्मा अवतार लिया मेरे

प्रिय मित्र आयोध्या नरेश दश्रत के परिवार में अपने तीन भाईयों

के साथ प्रभु की असीम कृपा से मुझे चार पुत्रों की प्राप्ती हुई

है सुमित्रा नंदन, लक्ष्म

कैकई नंदन भरद

और

मेरा जेश्ट पुत्र कौशल्या नंदन राम

ये मेरा सौभागे था

कि मैं पक्षी राज जटायू शिरी राम के दिव्य दर्शन कर बाया

युमराजों को चटायू का प्रणाम

ऐसी जल्म पत्र मैंने आज तक नहीं देखी। राम का भविष्य उजवल भी

है, और अंधकारमाई भी। एक और असीम समृत्ति है,

तो दूसरी हो रहा बात दरित्य था। हर बार

आपका पहला निवाला राम भाईया को ही क्यों मिलता है? क्योंकि राम सबसे बड़ा है, और म

अता प्रेम भी है और वियोग भी भारत राम

से कम है क्या पर महराज की पहली बढ़ाई राम को ही मिलती है

राम इतनी लाथ तक जागनी का

क्या कारण है मैं भाग्य के बारे में सोच रहा हूँ पिता जी सबका भाग्य एक जैसा क्यों

नहीं एक बालक खेते में परिश्रम करता

राजबहन के आराम भूखता है और लक्ष्मन तुम भी यही सोच रहा है नहीं

पिता जी भाईया को जब नीन नहीं आती तो मेरी भी नीन उठ जाती है अब जब तक इनके प्रश्नों

के उत्तर नहीं मिलेंगे ना इन्हें नीन दाएगी ना मैं सोप आँगा

राम सदा धन के म

राम के निन्ने ही तेह करेंगे कि वो अन्य राजाओं के तरब बला दिया जाएगा या युगों

युगों तक स्मरन किया जाएगा।

भाराज,

रिशी मुनियों की वार्तान आप से क्यात हुआ है कि विश्णू ने मानव अफ़तार में जनम ले

गया है और आपको परात करने के लिए उसने अश्टर शस्तर की विध्या

भी आरम कर दिया है

महराज इससे

पहले की ये चिंगारी आग बन जाये

आग से उठा है वो आग से क्या डरेगा

सैयम

सैयम

मुनिश्रेष्ट विश्व मिश्र। आपके आग्मन से अयोध्या की धर्ती धन्य हो गई।

तपस्या छोड़कर यहाँ आने का क्या कारण है?

रावण। विश्व कल्याण

के लिए मैं एक महा यज्य कर रहा हूँ। परन्तु रावण के तुट्ट राक्षस ताढ़का और स�

मैं और मेरी सेना यग्य संपन्न होने तक यग्य की रक्षा करेगे मैं तुमसे तुमारी

सेना नहीं केवल एक योधा मांगने आया हूँ

राम

शमा

करें बोनिवर

परन्तु तानका और सुबाहू जैसे मायावी राक्षसों का सामना राम कैसे करेगा?

राम में तुम केवल एक पुत्र देख रहे हो। परन्तु मुझे राम में एक तेजस्वी योध्धा

दिखाई दे रहा है। एक ऐसा योध्धा जिसने रणकोशल और अस्तर

शस्तर की वि�

उसके बाणों में आंधियों सा भेग

उसका

साहस बर्वतों सा भेग

अयोध्या उसे जितनी प्रिय है, उसे कहीं अधिक वो अयोध्या को प्रिय

है। शमा करें मुनिवर,

मैं आपके लिए अपने प्राण नियुचावर कर सकता हूँ,

परन्तु प्राण उसे प्रिय अपने बुत्र को निर्त्यु दंडर नहीं ले सकता। बास, अब मैं

ये

अपम

मैं अगर चाहूँ तो अभी श्राप देकर तुम्हें और तुम्हारी आयोध्या को भस्म कर सकता हूँ

प्रणाम स्विकार करें गुरुदेद

आपका क्रोध एक राजा पर उच्छत है, परन्तु एक पिता पर नहीं। ये

पुत्रमो है, जो इन्हें अपने धर्म से पीछे हटने पर विवश कर रहा है। तो तुम बताओ राम,

अगर ये निर्णय तुम्हें लेना होता, तो तुम क्या करते हैं?

मैं नहीं जानता कि मैं �

आपने महराज दशरच जैसे योधा और उनकी विशाल सेना के बदले मुझे चुना है। अवश्य ही आप

मुझे में कुछ ऐसा देख रहे हैं जो हम साधारन मुनुष्यों के समझ से बरे हैं। अपनी

योग्यता परखने का ऐसे अच्छा आवसर मुझे नहीं मिलेगा।

परन

मैं भी आपके साथ चलूंगा। नहीं भरत। जब अयोधिया में राम ना हो तो भरत का होना

आवश्यक है। भाईया का कहना उच्छत है। और वैसे भी मैं तो इनके साथ जाही रहूं।

गुरुदेव, लक्ष्मन भी हमारे साथ... वो क्या है न गुरुदेव। आप

याकिमे

तुने राम की चतुराई देखी, कैसे उसने भरत को साथ ले जाने से मना कर दिया,

ताकि राक्षसों को मानने का सारा श्रै, केवल राम को मिले।

चुक कर मन्थरा, जब मूँ खोलती है, विश्व गलती है,

मैंने तुझे कभी दासी नहीं माना, पर तो इसका अर्थ यह नहीं

एक समान है मैंने कब कहा

कि राम का पक्ष मत ले पर अपने सौतेले पुत्र से इतना भ्रेम

मत कर कि तेरे सबे पुत्र के साथ अन्याय हो जाए

इस वन में वन जैसे तो कुछ भी नहीं है। गुरुदेव, ये वन इतना शापित क्यों है?

वर्षों पूर्व ये वन भी बाकी वनों की तरह सुन्दर हुआ करता था। ताड़का और सुबाहों ने

इस पर अपना अधिकार जमा कर इसकी ये दशा कर दी। सास्त्र और

रिश

पर इन दुष्टों ने उन सब का भी अंत कर

दिया।

इसी

प्रलय पर विराम लगाने के लिए मैंने तुम्हें चुना है राम।

भाईया, हमने यह जगा जगा लगा तो दी हैं, पर अब तो आपको लगता है कि इतनी तैयारी

पर्याप्त हो गए हैं उन राक्षसों को रूपने के लिए, हमने तो ने देखा तक नहीं।

गुरुदेव,

आप यहाँ?

ताड़का और सुबाहू तुम्हें यहाँ नहीं मिलें

आपने कैसे जाना कि ये राक्षस है सुनो जब कोई राक्षस आसपास होता है

तो सारे जीवचुन तो शांत हो जाते हैं तुम जाकर देखो गुरुदेश

से खुशल है के नहीं भाईया मैं आपको जाओ रक्षमन

कर दो कर

दो

दुष्टों का कोई धरम नहीं होता राम। उनका विनाश ही सबसे बड़ा धरम है।

के विजय का संदेश लाया हमाराज

अब मैं तुम्हें अपने दिव्यास्तरों का ग्यान देकर तरवश्रेष्ट बनाना चाहता हूँ।

ये मेरा सोभाग्य होगा गुरुदेव।

समस्त देवों की शक्तियां तुम्हारे अंदर समाव चुकी है राम। तुम जब भी इनके मंत्रों

का उचारण करोगे, ये प्रकट हो जाएंगे। साधार अनस्तुरों से ताड़का और सुभाव जैसे

राक्षिसों का सामना करना पड़ा। अब इन

दिव्यास्तुरों

से न जब कोई और विकल्प न रह जाए। एक दो विधाव आ रहा है।

कुरुदेव, इन दिव्यास्तरों को केवल भगवान विश्णु और भगवान शिव के दिव्य धनुष से ही

साधा जा सकता है। वो हमें कैसे प्राप्त होंगे?

तुम दिखते नहीं हो, पर हो

बुद्धिम

तुम्हें मिथिला की राजकुमारी सीता के स्वैंबर में अर्जित करना होगा साइगडो

युद्धाओं के समक्ष अपनी वीरता का परिचे देकर सीता स्वैंबर

गुरुदेव वीरता का परिचे तो भाईया दे देंगे परन्तु उस कन्या का परिचे भी मिल जाता तो

हाँ

सीता कोई साधारन कन्या नहीं है राम वो धर्ती की कोग से जन्मी है

सीता शस्त्र विद्या में तो पारंगत है ही

उसे शास्त्रों का ग्यान भी प्राप्त है

भगवान

शिव का धनुष पिनाक जिसे उठाने के लिए सैक्डों युद्धाओं की अवश्चक्ता होती है

उसे सीता ने बाल अवस्था में ही बड़ी सहस्ता से उठा लिया था।

राम, तुम्हारे जीवन में जितना महत्वपूर्ण दिव्य धनुष है,

उतनी ही महत्वपूर्ण सीता भी है। अब भी कोई संदेह है राम। गुरुदेव,

यदि उस देवी के दर्शन भी हो जाएं

रामर्ष्च सीत यासार्धम। विजहार

वहुन्रुतु। मनस्वित अप्कत

मनस्तस्या। रदी सवर्थिता।

तम्म अनस्तास्या

अब समयमर में जाने वाले हैं

कर दो

ये परिक्षा शक्ति की नहीं, पाक्ति की है। क्या यहाँ कोई इतना बर्शाली नहीं,

जो शिव धनुष पर प्रतिंक्या चढ़ा सके। महाराज, अगर आपकी

अनुमती हो, तो मेरा शिष्य प्रयत्न कर सकता है। ये मेरा सौभाग्य होगा

मुनिवर।

शमा करें भगवान, मुझे शमा करें। अद्भोत!

आज चर्ण जनक!

आद्भोत ही है!

मुनिवर, आपका ये पराक्रमी शिष्य है कौन?

एक्षवाकु वंश के राजा दशरत का जेष्ट पुत्र,

राम

कुछ सुना था आप तो स्वयंवर में नहीं आने वाले थे तो ये रिदय परिवर्तन

हुआ कैसे?

थोड़ा तुम्हारे बारे में जानकर थोड़ा तुम्हें देखकर

तुम जानती थी कि मैं

धनुष उठा लूँगा?

नहीं पर मैं चाहती यही थी कि धनुष आप उठाएं

आपके बारे में जानकर थोड़ा आपको देखकर इसलिए सभी देवी देवताओं से प्रार्थना भी

की थे तुम्हारी प्रार्थना तो स्विकार हो गई

पता नहीं मेरे वचन का क्या होगा वचन?

मैंने अपने भाईयों को वचन दिया था कि हम सब एक साथ विवा करेंगे

ऐसा प्रतीत हो रहा है आपका वचन पूरा हो गया

कुछ

समय के लिए दुविधा में तो पढ़के थे आप यदि ये लोग नहीं

मिलते तो क्या हमारा विवाह नहीं होता?

जिस जोड़ी का भाग या स्वयंति वो ने लिखा उसे बनने से भला कौन रुख सकता है?

तू ही मुझे निरगुन का सरगुन अभिमान भी तू तू ही

है धरती की महिमान सम्मान भी तू तेरे होने

से ही मेरा होना है जन्मों से

संग तेरे ये तेरा है

मैं आपकी जीवन में सीता की कमीत तो पूरी नहीं कर सकता। परन्तु एक वच्चा

नवश्य दे सकता हूँ। आज से अंत तक मेरे जीवन में

सीता के सिवा और कोई स्त्री नहीं आएगी।

भगवान विष्णु के छटे अवधार परमशिव भक्त परशुराम।

सुनाया मैंने, शत्रियों को पृत्वी से अनेक बार नष्ट कर चुके

हैं। एक विभाह समारों में आपके जैसे युद्धा के आने का प्रयोजन

मैं समझा नहीं। मुझे तुम में या तुम्हारे सम

भगवान शिव के धनुष को तोड़ने का तो साहस किया है।

तो

तू है। तुझे केवल धनुष उठाने की अनुमति मिली थी उसे तोड़ने की

नहीं। इस अपरात का दन्द तुझे अवश्य मिलेगा। किस बात का दन्द?

भाईया का उद्देश शिषब धनुष को तोड़ना नहीं था। रत्यंच्या चड़ाते समय तूड़ गया। अब

तूड़ गया तो तूड़ गया। इसमें इतना क्रोधित होने की क्या वश्यकता है। अभी तूने मेरा

क्रोध देखा ही कहा है। मैं यहाँ केवल एक को तं

आप हमारी विनमरता को कायरता समझने की भूल ना करें हम आपका मान कर रहे हैं और आप

हमारा अपमान किये जा रहे हैं बड़ा पराक्रम ही है ना तू तुम्हा

युद्ध कर मुझसे

हम रगुवंशी

युद्ध के निमंतरण से पीछे नहीं हटते और रण में काल से भी नही

कर दो

भगवान मिश्रु का धन और शाराव स्वीकार

करें।

वर्षों

का योग्य समाप्त हुआ।

ये राम की उकारम है।

इतना प्रेम आपने अब तक मुझे दिया है। आशा करता हूँ अपना ये प्रेम आप सब

सिता को भी देंगे।

ये जोड़ी है किसने जोड़ी। शेटलाई।

मुझे स्वर्ग भी स्विकार नहीं है

किस प्रश्न का उत्तर ढूंढ रहा है तू इन ग्रहों में?

मां, कहीं कुछ बड़ा घटेत होने वाला है परन्तु क्या?

अयोध्या आप जैसे तेजस्वी, वीर और करुणावन राजा के राज में फल भूल रही है।

अयोध्या का भविष्या आपके हाथों सरक्षित है। मुझे राजा बनाने की इतनी शीरता क्यों?

मैं बुढ़ा हो गया हूँ राम। इस कारेबार से भी राम चाहता हूँ।

अ

अगर यही आपकी अच्छा है, तो मुझे स्विगार

है। देखो तो

सही, यह तुम पर कैसा लगता है।

सीता के आते ही पेरे राम का भागयोदय हो गया क्यों ना हो लक्ष्मी जी का अवतार जो

है हमारी सीता

नाम से अच्छा राजा हमें मिले ही नहीं सकता। माँजी,

शेगरता से चलिए। काम बहुत है। लो माँजी, आप भी मुँमिठा कीजिए।

मेरे राम के राज्य अविशेक के लिए ये कैसा रहेगा मथ्रा?

ये तुझ पर अधिक चचेगा। कैसे नहीं चचाए मथ्रा? ठीक

वैसी ही जैसी दश्रत ने तेरे साथ दिखाई है।

योध्या की प्रसंदता तो मुझे समझ आती है।

पर तू किस बात पर इतनी प्रसन है?

जब तेरे पिता ने इस बुड़े राजा से तेरा विवाग करवाया था तब दर्शरत ने एक वचन दिया

था कि तेरा पुत्र ही राजा बनेगा तो कैसी मा है तू

जो अपने पुत्र पर हो रहे इस घोर अन्याय से भी आनन्दित है

राम मेरे पुत्र समान है बस

सगा तो उस

तुझे क्या लगता है?

तेरे आने से कोशल्या प्रसंद नती हरी मूर्ख सौतन चाहे कितना

भी प्रेम जता ले मन में तो विश ही भरा होता है ना

ये कई-कई पर कितनी सुन्दर लगेगी ना

ये भरत भी राम से अध्यधिक प्रेम करता है पर क्या राम भरत से प्रेम

करता है

राम को तब राजा क्यों बनाया जा रहा है जब भरत यहाँ उपस्थित नहीं

क्योंकि इस अन्याय के बाद दशरत भरत से आँख कैसे मिलाएगा

और इसमें भरत भी राजा का भाई लगेगा वो दिन दूर नहीं जब

तुझे और भरत को राज भवन के किसी कोने में डाल दि

तो फिर मैं क्या करूँ, मंत्रा?

कोपभवन चली जाओ। तश्रक से अपने अधिकार के लिए लड़। अगर आज तुन्हें कुछ नहीं किया,

तो कल इस राजभवन पर ना तेरा, ना भरत का कोई अधिकार रह जाएगा। सीता मेरे

आभूषण पर नहीं। उतार के भेख �

चारों और अंधकार कर

दो।

क्या कहीं?

क्या हुआ तुम्हें?

तुम्हारी ये देशा किसने की?

आपने महाराज।

जो तुम मांग रही हो वो मैं नहीं दे सकता। एक बात याद रखना, जब भी मुझे मेरे पुत्र

और तुम मेंसे किसी एक को चुनना पड़ेगा, मैं हर बार, निस्संदे, अपने पुत्र

को ही चुनूगा। मैं तो चाहती हूँ कि आप अपने पुत्र को ही चुने। उस �

उस वचन को भी भूल गए जो आपने मुझे युद्ध भूमी में आपके प्रान बचाने के लिए दिया

था। क्या एक इक्षवा को वंश के राजा के देव हुए वचन का कोई मूल

नहीं।

बच्चबन

से सुनता आया हूँ कि होता वही है जो भाग्य में लिखा हूँ।

और बश्पन से यही जानने की चिक्यासा रही कि मेरे भाग्या में लिखा क्या है

अब तो दिव्यागणी ने आपका भाग्या मेरे भाग्या के साथ चोड़ दिया है क्या लिखा

है अगर पढ़ पाए तो मुझे अवश्य बताईएगा यूबराज महाराणी कह

कही और महारा�

पिताजी, सब कुछ अन्मंगल तो है न?

राम,

क्या तुम मेरी आंग्या का पार्ण करोगे?

अंतिम सास तक पिताजी तो उठाओ ये दिल्लार उठाओ ये दिल्लार उठाओ

मेरे सीने में

बात गया है पिता जी?

ऐसा कौन सा संकट है जिसका हल नहीं ढूने जा सकता?

अधिक शक्तिशाली क्या है राम?

एक एक्षवाकु वंश के राजा की तलवार?

या उसका दिया हुआ वचन?

निसंदे दिया हुआ वचन.

जो राजा अपने वचन का मान नहीं रखता,

प्रजा

उस कि वीरों की भाती उनने मुझे जो वचन दिये थे, उनसे कायरों की भाती पीछे हटना

उजित नहीं। एक पुत्र होने के नादे, अपने पिता के वचन का

पालन करना मेरा कर्तव्य है। आदेश दे चोटी मां।

पहली सुन लो राम, फिर निर्ने लेना,

ताकि बाद में त�

इनने मैं ले चुका हूँ आप आदेश दे राज

सिहासन भरत के लिए भरत

में एक महान राजा बनने के सारे गुणे

आपका अगला

देश तुम्हारे लिए

चौथा वर्ष का वनवास

असंभव

मेरे जीवित रहते ये कदापी संभव नहीं है धर्म कहता है कि अगर राजा की मती भरस्ट हो

जाए और कोई उसका अनुचत लाव उठाने का प्रेतने करे तो दोनों को मार देना चाहिए

ऐश्पत भाईया किसे मार देना चाहिए

उस पित

उस मां को जिसने यह वचन अर्जित की है और उस भाई को, जिसे सब का कोई क्यानी नहीं

है।

दाजी,

मैं

नहीं जानता कि आप मुझे राजात क्यों बनाना चाहते थे।

और मैं यह भी नहीं जानता कि आप मुझे वनवास क्यों भेजना चाहती हैं। पर जैसे मुझे वो

आदेश स्विकार था, मुझे यह आदेश भी स्विकार है।

आप निश्चिंद रहें, आपके दोनों आदेशों का पालन होगा।

परन्तु ये सब करने की आवश्यकता नहीं थी छोड़ी मैं। आप जो चाहें मांग लेती।

इतना अधिकार तो है आपका मुझे पर।

मैं तुम्हें अपने साथ चलने की अनुमति नहीं दे सकता

सीधे

ये वन्वास मेरा है तुम्हारा नहीं

एक वचन का पालन करने के लिए 14 वर्ष का वन्वास विकार कर

लिया और दूसरा वचन तोड़ने में एक शन भी नहीं लगाया

उस वचन का क्या, जो आपने मुझे विवाह के समय दिया था, हर सुख दुख में साथ रहने का

वचन, क्या उस वचन का कोई मूल नहीं?

मैंने कहा था न, अब हमारा भागे एक है, और भागे में जो भी लिखा है,

मुझे स्वीकार है.

पचन मैं भी आपसे चाहता हूँ छोटी मां। जब मैं वनवास समाप करके वापस हूँ

तो आपका पहला निवाला मुझे ही मिलना चाहिए। वाव सबसे बड़ा है

और मेरा सबसे प्रेत है।

मुझे एक शमा कर दो राव मुझे एक शमा कर दो मुझे एक शमा

अगर आप वास्तव में मुझसे प्रेम करते हैं अगर आपके रिदे में मेरे लिए थोड़ी भी जगा

है तो मेरी बिंदी स्विकार कीजिए हमें मत रोकिये अगर

आपकी यही इच्छा है तो हम आपको नहीं रोकेगे किस तरह माता सीता और युरात लक्ष्मन आपके

साथ जा रहे हैं। हम भी आपके साथ जा रहे हैं। राम जा रहे हैं।

अपना पुत्र धर्म निभाने के लिए। उनकी पत्नी होने के नाथे

ये मेरा धर्म है कि मैं उनके साथ जाओं।

लक्ष्मन भाई होने का धर्म निभा रहा है।

इसी प्रका कि हमारी अनुपुस्थिति में

अयोध्या के देखभाल करना और उसे सम्रिध बनाए रखना। जैसे हम अपना

धर्म निभा रहे हैं, आप अपना धर्म निभाईं।

हमें जाने दिचिये।

यही मेरे कर्मों का फल है। जो आज मुझे मिल रहा

है।

राम

मुझे मिले हुए शाब का फल भुगत रहा है।

इस हाल में होगा

समारों में स्वागत है विद्धुचीव जिसके सम्मान में ये समारों हो रहा है वो अभी भी

सो रहा है

आयो स्माइट बाव

शयनकक्ष और पारिवारिक समारों में अंतर होता है विद्युक्षीव राजा हो तुम

मर्यादा में रहना तुम्हारे लिए उचित होगा

अब तु मुझे शिष्टाचार का पाठ पढ़ाएगा रावन

कदाचे तुझे ग्याद ही नहीं कि एक राजा का व्यभार

कैसा होता है यात होगा भी कैसे दास था न तू

और दास ही रहता

यदि मैंने तेरी साहिता नहीं की होती और ये समारो

तेरे इस मूर्ख भाई की तरह निद्रा से भरपूर है

यदि समारों में आनंद लेने योग्य कुछ है तो वो है ये मदिरा

जो समाप्त हो गई है

तुझे राजा का धर्म निभाना नहीं आता

और एक दास का धर्म तो अच्छी तरह से निभा

आओ तुम्हारा उचित सम्मान करते हैं

दुख है इन्हें हमारे समहारों में आनंद नहीं आ रहा है

तो क्यों न कुछ ऐसा किया जाए

जो इनकी वीरता के लिए उपयुक्त हो मेरे और

मेरे मित्र के बीच एक मित्र वत्युत्र

यह

एंकार

इसलिए ना

कि तुझे ब्रह्मा का वर्दान प्राप्त है और तु जानता है

मैं तेरा वद्ध नहीं कर सकता

तो तु मेरा वद्ध करना चाहता है

वो किसी और समय ये

समय है मेरी प्रजा के मनोरज्जन का

इनके मनुरंजन में मेरी कोई रुची नहीं है

और लंका में

लंका

में तो है ना

युद्ध

में

यदि विद्युत चीव मेरे शरीर से एक बून्द एक बून्द रक्त

भी भा पाया तो लंका उसकी

एक

बून्द और मैंने

जो इतनी

मजरा पी रखी है, उसका क्या?

और कुछ?

याद रहा कि तब मैं कौन था

तो तु ये कैसे भूल गया

कि अब

के वैभव में केवल राजकुमार जनम लेते हैं परन्तु

एक राजा रक्त बहाकर घाव खाकर

जनम लेता है रण भूमी में रण

मिद्र शमा

शमा

भाईया, मुझे लगता है महारिशी विश्वमित्र को क्यात था, कि आपको बनवास का उपार मिलने

वाला है, वो हमें ताड़का के लिए नहीं, उससे भी बड़ी राक्षसी, कहीं कहीं के लिए

तैयार कर रहे थे। अपने बाणों पर नियंतरण करना तो तुमने सीख

लिया

तुम भरत को समझ नहीं भाई लक्ष्मण। भरत को राजपाट का कोई लोग नहीं है। अगर

तुम भी उसे राज यहाँ सर माँग लो, तो उनने संकोई दे देगा।

आप में सारे गुणें बस थोड़ी कोटलता भी होते हैं तो आज आप वन में नहीं राजभावन

में होते हैं आप बाहे फैला कर उसका स्वागत कीजिए मैं तलवार निकाल कर उसका सामना करता

हूँ

कुछ चलता है पिताजी कैसे

मुझे इक्षमा कर दीजिए भाईया ये सब मेरे कारण हुआ है पर तु

इसका मुझे कोई ज्ञान नहीं था

और जिस माने ऐसा नीच कर्म किया है उससे मैंने पुत्र कहने का अधिकार भी छीट लिया

है छोड़ी मा के बारे में ऐसे अपशब्द कहना उचित नहीं है भरत उन्होंने जो भी किया

तुम्हारे मुह में किया राज सिहासन पर आपका अधिकार है भाईया

मेरा नहीं पिता�

अयोध्या चाहती है आप राजा भर भाईया आप वापस चली मैं

अयोध्या वापस नहीं आ सकता भर मैं वचन बद हूँ परन्तु क्यों भाईया

जिसके लिए वचन मांगा था वो चाहता है कि आप अयोध्या वापस चाहे जिनने

वचन दिया था वो अब रहे नहीं

तो आप

कि उनके दिए हुए वचनों का कोई मूल न रहे और तुम्हें लगता है एक वचन हमें याल आया

है नहीं लक्ष्मा इसके बीचे

अवश्य कोई देविय संकेत है अगर हम बापस लोड़ गए तो ये कभी नहीं जान पाएंगे कि जो

हुआ वो क्यों हो इन प्रश्नों के उत्

मैं ये वन्वास समाप्त करके ही आयोध्या लोटूंगा।

अगर ये आपका निर्णय है भाईया,

मुझे स्वीकार है। परन्तु जिस तरह आप वचन पद्ध है,

मैं भी आज एक वचन लेता। मैं आयोध्या पर राज नहीं

करूँगा। मैं और शत्रुखन आपके अनुया

आयोध्या का कारेबार संभालेंगे। बस एक निवेदन है।

मुझे अपनी पादों काई दे दीजिये। ताकि मैं इन्हें

सिहासन पर रखकर अपने धर्म का पालन कर सकूँ।

परन्तु यहाँ रुकने में क्या आप दी भाईयो?

यह वन अयोध्या के सीमा पर है। इसके आगे पता नहीं क्या होगा। अयोध्या वासी

अब जान चुके है कि मैं यहाँ हूँ और मेरे यहाँ रहते। वो भारत के मेरे नहीं कभी

स्विखार नहीं करेंगे। यह

अयोध्य

कितना था?

हाँ? साथ... पचास साज़र आई!

फोन और बेट जॉइन करो और हीरो की तरह खेलो एविएडर, क्रेजी टाइम, अंदर बहार कुछ साथ

सो प्रतिशत का बोनास, प्रोमो कोड, हीरो के साथ

विद्यूजीव की मृत्यू का कारण मैं नहीं,

वो स्वयं था। अपने कुल का अपमान ना मैंने आज तक सहा है, ना कभी

सहूंगा। पर अब तो वो इसका पती था। इसलिए उसको इतनी आसानी से मुक्त कर दिया।

अन्य था उसको इतनी यादनाई दी था, कि स्वयं ब्र

तुम्हारा और उसका विवाह एक कूटनीतिक गटबंदन था इसकी अब हमें कोई आवशक्ता नहीं

है यदि आपको आपत्ती ना हो तो भेन सूर्पनखा हमारे साथ जनस्तान आकर रह सकती है

अती उत्तम जाओ सूर्पनखा एक नया जीवन आरम करो

तुम जिसको भी चुनो�

ऐसा भयानक वन मैंने आज तक नहीं देखा ये तो कुछ भी नहीं है माते जिस वन में गुरु

विश्वमित्र हमें लेकर गये थे वो इसे कहीं अधिक भयानक था

नहीं

ये अधिक भयानक है

मुने मेरा गस्तिया

ये मेरा सौभाग्या है कि आप जैसे तेजस्वी से भेंट करने का आवसर मुझे प्राप्त हुआ।

मैं कई वर्षों से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि आप मेरे

बारे में सब कुछ जानते हैं। तुम क्या जानना जाते हो?

मेरा जन्म किस

उद

वनवास पर जाने का निर्णय तुम्हारा था। अयोध्या वापस ना जाने का निर्णय भी

तुम्हारा था। आज जो तुम मेरे समक्ष बैठे हो, इसके पीछे भी तुम्हारे लिए गए निर्णय

ही है। सीता, एक राजकुमारी चाहे राजभवन में हो या वन

में,

बिना

ये दिव्यतुनीर स्वीकार करो इसके बाण कभी समात नहीं होगे

मनिवर एक राक्षस को तो मैंने भी मारा था

मारा था ना

इस

सुरक्षा मंत्र का इसमरण कर लेना कोई भी इसे पार नहीं कर पाएगा जाओ

राम

ब्रह्मान को प्रणाम कर उसे धन्यवाद दो एक संपूर्ण योद्धा के रूप में आज तुम्हारा

प्रधाम दिवस है

ये पंचवटी कितनी सुन्दर जगा है ना तुम जहाँ जाती हो वो जगा

सुन्दर बना ही लेती हो करके हमने कुटिया बना ही है माते

कहीं भरत भाईया यहाँ भी ना चले यहाँ एकशमा मांगने अन्यथा यहाँ से भी जाना पड़ेगा

कौन हो तुम, जो हम असुरों की भूमी पर बिना अनुमती खुसाए हो?

हम मनवास हैं, यहां आश्रे लेने आये हैं

आश्रे

लेने आये हो, तो मेरे राक्षसों को मारने का दुसाहस कैसे किया?

आक्रमन उन राक्षसों ने किया था, हमने शस्त्र केवल आत्मरक्षा में उठा

जो हमारा अधिकार है। भय नहीं लगा तुम्हें?

भय अनुच्छत कार्य करने में लगता है। उच्छत कार्य में कैसा भय?

वेशभूषा से तो बनवासी हो। परन्तु आछरण बिल्कुल योधाओं जैसा

है। आपका अनुमाद सही है। हम अयोध्या के राजपरिवार से

श्रीराम, भावीमा सीता और मैं लक्ष्मण।

और मैं जनस्थान की राजकुमारी

सुर्पनखा। आओ मेरे साथ, मेरे राजभवन में

रहो और हमारे अतिथी सत्कार का आनंद लो। आपके इस प्रस्ताफ के लिए धन्यवाद

राजकुमारी। परन्तु हम अन्वास के लिए

राजभवन में शरण देने से बचन तूट जाएगा और दियावा बचन भाईया कभी नहीं तोड़ता

वो मोहित हो गए आप पर। तुम्हें कैसा पता?

एक स्त्री दूसरी स्त्री के मन की बात जान ही लेती है।

राजकुमारी, आप?

क्या मैं तुमसे कुछ मांग सकती हूँ?

मुश्य। जब से मैंने तुम्हें देखा है, तुम्हारी छवी मेरे मन में

बस गई है। मैं तुमसे विवाह करना

चाहती हूँ। यह आप क्या कह रही है?

इसमें संकोच कैसा?

मेरा विवा सीता से हो चुका है मैं सीता की जगह नहीं तुम्हारी दूसरी पत्नी बन

कर रहूंगी और तुम्हारे पिता की भी तो तीन राणिया थी तो फिर मुझसे विवा

करने में कैसी आपत्ती राजकुमारी हूँ सुन्दर भी हूँ आपके पास

सब कुछ है राजकुम

मेरे रिदे में सीता के प्रेम के सिवा किसी और के प्रेम के लिए जगाई नहीं है।

मुझे शमा कीजिए।

क्या बात कर रहे थे आप उस राजकुमारी से?

तुम देख रही थी?

बताइये ना.

बता दूँ.

मुझसे विवाग करके मुझे राजा बनाना चाहती है.

तो बन जाये उसका राजा.

अगर उसका राजा बन गया तो तुम्हारा सेवक कौन बनेगा?

बहुत ही संदर है वो सोच लीजिए एक सेवक को राजा बनने का अवसर बार-बार

नहीं मिलता जब सूर्या की किरण साथ हो तो जुगनोव से कैसा आकरशन?

माते?

अक्षोल?

नीच राक्षसी?

तिरा ये तु साहस मा सीता का भेज धारण करके भाईया से छल कर रही है तू

आज मैं तुझे ऐसा दन दूँगा कि तु जब भी कोई भेज धारण करेगी अपना वास्तविक रूप

छुपा नहीं पाएगी

तो मैं इस

समस्या को ही समाप कर देती हूँ

तुमने क्या किया लक्ष्मन?

उसने आपका भेज़ धारण करके भाईया के साथ स्वांग रचने का जो पाप किया है उसके लिए

यही उचित दन्द है माते तुम उसे डरा के यहाँ से भगा सकते थे तुम्हारे भाईया उसे

समझा सकते थे उसका दूश इतना बड़ा भी

न

राजकुमारी सूर्पनखा के साथ जो हुआ वो उचित नहीं था। किसी भी स्त्री

के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए। हम नमरता से निवेदन करते

हैं। युद्र से किसी का भला नहीं होगा। आख्रमण।

तुम

सीता को जोर ले कर जाओ। बातें।

पत्नी की नाग करते हुए तो देख लो और अपने भाई की मृत्यों भी

प्रमान की कोई भी शक्ति सीता और लक्ष्मन को शती नहीं पहुचा सकती।

तुम्हारे इस दुस्साहस के लिए

मैं तुम्हें मृत्यू दंड देता हूँ।

राम और उसका भाई लक्ष्मन परन्तु ये सब आपके कारण हुआ है भाईया

ना आप विद्यूजीप का वद करते ना मैं राम को पाने की लालसा रखती

और ना ही मेरी ये दुरदर्शा होती मैंने आपको पहले ही चिताया था महराज

सुप रखा का ग्रोज स्वाभाविक ह

दिकार है तुझ जैसे भाई पर, जो अपनी बेहन का अपमान होने पर सैयम की बात कर रहा है।

तुम्हारे साथ जो हुआ उसका दुख मुझे भी है सूगनका, परन्तु राम कोई दिव्य स्वरूप

प्रतीद होता है। क्योंकि कोई भी साधारन मनुष्य,

ताड़का,

सुब

संभव है ब्रह्मा जी से वर्दान मांगते समय भाईया आपने

मनुष्यों से अमर्ता नहीं मागी थी तो तुझे भाईया की वीरता पर संदेह है मैं केवल

भाग्य पर संदेह कर रहा हूँ जो चाहता है कि राम और रामड के बीच युद्ध हो ताकि आपका

अंत किया जा सके

अपनी बहन पर हुए अत्याचार का प्रतिशोध लो

चुप

रहा जाए या युद्ध किया जाए

विश्णू के सर्वनाश के लिए तूने इतनी प्रदीक्षा की है। अबे संशय क्यों?

संशय इसलिए मूर्क कि राम से युद्ध किया तो मित्यू

निश्चित है। मित्यू पर विजय प्राप्त करके ही तो दशानन रामाद बना है।

विजय हमारी होगी और मित्यू विश्

क्योंकि तुन्हे सुर सादना की जगह असुर सादना को चुना अपनों का

भुकतेगा वो इसने रावन की बहन का पान किया है और बहन का प्रतिशूद

राम की पत्नी के साथ लिया जाये ये

उच्छित रहेगा नहीं एक और स्त्री और कितने श्राप लेगा अब

और नहीं बा

ये मुर्खता समाप्त कराओ समाप्त कराओ अब सब विश्रू के साथ ही समाप्त

होगा ब्रह्मा ने तुझे अमर्ता परदान नहीं की थी विश्रू का वद कर अमर हो जाएगा

ग्रहों की दशा बदा रही है कि यही उचित समय है

परम ज्ञानी है तू उचित अनुचित का ज

युद्धकर, युद्ध ने तुझे सब कुछ दिया है। और युद्ध से ही तेरा अंत लोगा। जाग जा,

भाग जा, जाग जा, जाग जा, जाग जा, जाग जा, जाग जा, जाग जा, जाग जा, जाग जा, जाग जा,

जाग जा, जाग जा, जाग जा, जाग जा,

जाग

जा

जिसकी प्रतिक्षा मैं वर्षों से कर रहा था राम सिर्फ पतिशोद लिया जाएगा सूर

पढ़का और ऐसे लिया जाएगा कि अगंत काल तक

तीनों लोकों में कोई भी असुरों को अपमानित करने का दुसाहस नहीं करेगा

नराम की मृत्यू साधारन होगी ना उसका अपमा

मैं उसे किसी वन में छुपा कर नहीं। पूरे प्रमान को दिखथा कर, तरसा कर,

तड़पा कर मारूँगा।

लंका

की जिस भूमी पर हमारे कुल का अपमान हुआ। मैं राम को वही लाकर

मारूँगा। विश्टू के अहंकार का अंत होगा।

विश्णू के अंतिम अवतार का अंत होगा

आपकी वाणी सुनकर मेरी हर शंका दोर हो जाती है। आपकी मुस्कान

मुझे विश्वास दलाती है कि सब ठीक है। आप साथ हैं

तो मैं निर्भय हूँ। निश्चन करूँ।

ये सब क्यों कह रही हो सीधे?

कल योद्ध में एक शण ऐसा आया था, जब मुझे लगा कि मैं आपको खो दूँगी। और उस एक शण

में मुझे यह आभास हुआ कि आपके बिना मेरी जीवन का कोई मुल नहीं।

एक बात मैंने भी तुमसे कभी कहीं नहीं। मैं नहीं चाहता

था कि तुम वनवास के लिए आओ।

परन्तु तुम्हारे साथ में इस

वनवास को भी सुखत बना दिया है।

क्या आपके मन में कभी मुझे खोने की आशंका नहीं आई?

नहीं, क्योंकि मैं तुम्हें खोने की कल्पना भी नहीं कर सकता, तो व्यर्त की आशंका

क्यों?

आपके उपचार ने तो चमदकार कर दिया माते, सारे खावर शिकरता से भर गया, ये देखी

भाईया.

वो हिरन कितना सुन्दर और चंचल है। मैंने कभी इतना अद्भूत जीव नहीं दिखा।

ऐसा हिरन होना संभव नहीं है माते। ये कोई मायावी

राक्षस भी हो सकता है। तुम्हें तो हर जीव में राक्षस और हर और शत्रु ही दिखते हैं

लक्ष्मन। राम, मुझे वो ह

इनके छलावे में नहीं आना चाहिए। अगर वो सच में एक राक्षस है, तो

ऐसे मायावी राक्षस का वत करना मेरा कर्तव्य है। और अगर वो एक साधारन सा हेरन

है, तो सीता को उसे पालने का अधिकार भी मिलना चाहिए। तुम यहाँ सीता के साथ

रुखो।

पहली बार तुमने मुझे कुछ मांगा है

लक्ष्मन, सुना तुमने वो?

हाँ माते, सुना मैंने। तुम्हारे भाईया, उन पर कोई विबदा आई है।

वो तुम्हें पुकार रहे हैं। भाईया कभी ऐसे नहीं पुकारेंगे माते। ये नसंदे उस मायावी

राक्षस की की चाल है। नहीं लक्ष्मन, ये मेरे राम ह

तुम्हारे भाईया संकट में है और तुम यहाँ उभास कर रहे हो या तो तुम्हारे रिदय में

अपने भाई के लिए प्रेम कम हो गया है या तुम अपनी भावी का आदर करना भूल गए हो

यह आप उस भाई से कह रहे हैं मातवे जो राजभवन

की सुख दिया कर अपनी पत

आप जितने चाहे मुझे लांचन लगा लीजे मातिम परन्तु मैं आपको छोड़ कर नहीं जाओंगा तो

ठीक है अपने राम की रक्षा मैं स्वयम करूँगी मातिम रूप जाए मातिम

मैं जाओंगा आपने मेरे लिए कोई और विकल्प छोड़ा नहीं

है परन्तु भाईया �

आपके त्रिक्त इस रेखा को पार करने वाला हर जीव धर्दी माकी कर्प की अगनी में छुलस कर

भस्म हो जाएगा आपसे केवल एक अनुरोध है माते किसी भी परस्थिती में इस रेका को पार

मत कीजिए कम।

प्रणाम महत्मन कल्यान हो

आप इस भूमी पर क्या कर रहे हैं?

क्या आपको रक्षसों का भै नहीं है?

जो सोते जाते उठते बैठते बस भगवान शिव का स्मरन करें, उसको किस बात

का भै?

मैं तो अगस्य मुनी के आश्रम की ओर बढ़ रहा था.

रास्ता भटक कर यहां आ गया.

बहुत भूग लगी है

तुम एक साधू पर संदेह कर रही हो। इस राक्षस भूमी पर सुरक्षित रहने के लिए

संदेह करना आवश्यक है। याद रख। तु अपनी चौकट से एक साधू को भूका

लोटा रही है। अमंगल होगा। और अमंगल। तुम यहाँ नहीं आना चाहिए

दालक्षमन।

121 सुक्त के प्रधम दो मंत्रों का उच्छारन करके मेरी शंका दूर करें। एक

भूके प्यासे साधु को अन्न चल परोसने की बजाय उसका उपहास कर रही

है। लगता है तुझ में उदार्धा का भाव है ही नहीं। शमा करें।

यह आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषम यस्य देवा

यस्य छाया मृतम यस्य मृत्यू कस्मई देवाय हविशा विधेम

शमा करें महत्मन शान्त हो गया तेरा एंकार

ये अपमान अपने पास रख मैं गही

और जाके बिक्षमानूँगा नहीं नहीं रुकिये महत्मन रुकिये

मुझे जो चाहिए वो मेरे सामने है

अजय को अजय को अजय को

अजय

को

करते हैं

तुम्हें लगता है मेरा भरन करने से तुम्हारा प्रतिश्वत पूरा हो जाएगा कदा भी

नहीं इसका परिणाम युद्ध होगा क्योंकि मेरे राम

मुझे लेने अवश्य आएंगे और वो तुम्हारे अंत का

आरम होगा

कर दो कर दो

ये सब कैसे हुआ?

मुझे क्षमा कर दो मैं सीता की रक्षा नहीं कर बाया

क्या हुआ सीता का?

कहा है सीता?

राबन सीता

को हर के

लंका ले गया है किस ओर है लंका जहां भी हो भाईया हम वहाँ जाकर भावी मा को

बापस ले कर आएगे ये इतना सरल नहीं होगा

क्योंकि लंका तक पहुँचना असंभव है

रावन

लोगों का स्वामी है। उसे ब्रह्मा और शिव का वर्दान

प्राप्त है। आज तक उसे

कोई भी पराश्ट नहीं कर सका। उसका

भाई कुम्बकर्ण समस्त प्रमाण में सबसे विशाल,

सबसे शक्तिशाली योद्धा है। प्रणभूमी में उसे

परास्थ करना संभव है। उसका पुत्र मेगनाद,

रावन जितना बलशाली है, ऐसा कोई नहीं है

जो उसकी मायावी शक्तियों का सामना कर सके।

रावन की सेना में एक से बढ़कर एक

असंख्य योदा है।

इन सब को पराजित करने के लिए विश्व की कोई भी

साधारन सेना पर्याप्त नहीं है और

तुम्हारे पास कोई नहीं

मैं जब राजात दशरात से फेंट होगी तो उनसे ये सब

कैसे कहूँगा?

आप भी मेरे पिता सम्मान हैं उन्होंने भी अपनी अंतिम समय

में बहुत कश्चेरित हैं मैं आपको यह उन्हें और पीड़ा नहीं पहुचाना चाहता

उनसे कहिएगा

कि हम शीरे ही वनभास समात करके आयोध्या वापस लोट जाएंगे।

क्यों चुना गया है मुझे?

अपनी मां के हाथों वन्वास भुकतने के लिए?

पिताजी के अंतिम समय में उनसे दूर रहने के लिए?

और आज, अपनी प्रिय सीधा का हरण मुदे देखने के लिए?

मेरा भाग्या है तो मुझे यह स्विकार नहीं

है। मैं आज से अपना भाग्या स्वयम

लिखूंगा। धरातल पर, रसातल में,

जहाँ कहीं भी लंका है मैं उसे ढूंढ निकालूँगा। रावण

तीनों लोकों का स्वामी है।

तो तीनों लोगों के सामने उसका वद करूँगा। अगर उसके भाई,

उसके पुत्र, उसकी सेना किसी ने भी मुझे रोकने का प्रयास किया,

मैं उन्हें मारने में एक शण भी संगोच नहीं करूँगा। मैं अपनी सीता को वापस

लाऊँगा। ये एक इक्षवाकू वन्�

यह राम का वजन है

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