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Original subtitles

शहदूल शहर श्री गंगा नगर राजस्थान दिन था 9th सक्टेंबर 1973 का

सुबह 7 बजे श्याम सिंग हर रोज की तरह शहर के गुरुद्वारे में साफ सफाई

करने और धूब जलाने जा रहा था गुरुद्वारे के दर्वाजे तक पहुँशने पर उन्होंने देखा

कि उस ये सब देखकर

उन्हें लगा कि शायद गृद्वारे के अंदर रह रहे केयर टेकर अभी तक सो रहे होंगे। सो

उन्होंने बिना ज़्यादा सोचे गृद्वारे का दरवाजा खोला लेकिन अंदर जो था उसे देखने

के लिए वो बिलकुल भी रेडी नहीं थे। क्योंकि �

गुरुद्वारे में मौजूद हर एक चीज जमीन पर बिखरी भी थी और सारे कमरे के ताले भी तूटे

वे थे ऐसा लग रहा था कि मानो वहाँ कोई तूफान आया हो ये सीन देखने के बाद शाम

सिंग की रूख आग गई और वो उल्टे पाउं वापस गाउं भाग गए

ग

क्योंकि उन तीनों में से करतार सिंग ने अब सांसे लेना बंद कर दिया था और बाकी बच्चे

मादा सिंग और वजीर सिंग दर्द में पूरी तरह चीक रहे थे उन्हें तुरंत लोकल हॉस्पिटल ले

जाये गया पर अन्फॉर्चनेटली मादा सिंग ने भी रास्ते में ही

अब वजीर सिंग ही एकलोता आदमी था जो गाउंवालों को बता पाता कि आखिर उनके साथ

ये सब कैसे हुआ था लेकिन वजीर सिंग देख नहीं सकता था जिसके कारण he had zero idea

कि ये सब कुछ कैसे और किसने किया था एक गुरुदवारे जैसे holy place में ऐसा कुछ

होने के बारे मे

जब पुलिस ने इसकी investigation करी तो उन्होंने देखा कि तीनों caretakers के कान

के ठीक नीचे बहुत बुरी तरह वार किया गया था और ये देखते ही पुलिस के भी रौंगते

खड़े हो गए थे क्योंकि ऐसा कुछ वो पहली बार देख रहे थे इससे पहले राजिस्तान

हर्याना और पंजाब के एरिया में उन्होंने आल्मोस 70 ऐसे केसेज देखे थे जहाँ पर

विक्टम्स की जान सेम इसी तरह से ली गई थी कान के नीचे चोट पहुचा कर और ये सारी की

सारी केलिंग्स रात के अंधेरे में हुआ करती थी जिसके कारण वहाँ के लोग

बहुत

�

के बारे में जब सब लोगों को पता चला तो ये डर का माहौल और भी जदा बढ़ गया था जो कोई

भी लोगों की इस तरह जान ले रहा था उसे locals कनपट्टी मार के नाम से जाने लगे थे

which literally means the one who strikes beneath the ears लेकिन again

किसी को भी कोई अंदाजा नहीं था कि ये आदमी कौन था और ये क्यों लोगों की जाने ले रहा

था आज का एक case बहुत ही जादा unique है क्योंकि इसमें कहीं सारे लोगों की मौत हुई

थी लेकिन आप

लोगो

उस किलर ने खुद ही अपने सारे के सारे क्राइम्स कंफेस कर दिये थे

ये

वो

समय था जब देश को आजाद हुए सिर्फ पांच साल ही हुए थे इंडिया पाकिस्तान के सेपरेशन के

कारण कई फैमिलीज हमेशा के लिए तूर गई थी जिसके कारण आए दिन दंगे हो रहे �

government पर बहुत सारा financial burden था और इंडिया को reform करना एक काफी बड़ा

challenge साबित होने वाला था so overall आने वाले time में इंडिया एक बहुत ही

vulnerable country होने वाली थी इस critical time में in 1952 जैपुर

राजिस्थान के रहने वाले एक middle class family को एक लड़का हुआ जिसका नाम

उन्होंने शंकर प्रजापत रख उस समय राजिस्थान जैसी जगह में लड़कियों को लेकर

कैसे सेंटिमेंट्स है वो तो हम सभी जानते हैं तो एक middle class family में एक

लड़के का पैदा होना उनके parents के लिए एक वरदान से कम नहीं था शंकर के माबाब ने

ये सपना देखा था कि उनका बेटा बड़ा होकर पढ़ �

expectation से जो उनकी उम्मीद थी वो सारी की सारी तूटने लगी थी उससे और धीरे धीरे

उनका behavior शंकर के तरफ change होने लगा था उन्हें इतना समझ आ गया था कि शंकर

पढ़ाई लिखाई नहीं करने वाला है इसलिए उन्होंने उसके ऊपर पैसे खर्च करना भी बंद

कर दिया

था

अपना हाथ उठा लिया था और जब अपनी needs को पूरा करने के लिए उसके पास पैसे नहीं रहते

थे तब वो अपने पड़ोस में चोटी मोटी चोडिया करा करता था and to be honest I have seen

so many people जिनके पास पैसे नहीं होते हैं so they try whatever they can to

survive and will पर अगर तुम लोग के पास अपना खुद का extra

प

ये चीज जाने के लिए तुम लोग नीचे pinned comment में click करो और वहाँ पे

तुम्हारे सारे के सारे questions के answer तुम्हें मिल जाएंगे so go check it

out but in this there is no need to ask other people for money so तुम लोग के पास

अगर extra पैसा है और अगर तुम लोग एक old responsible player हो then go check out

my link in the pinned comment

और मारा भी था लेकिन वो रुकने का नाम ही नहीं लेता था शंकर को उसके माबाब ने

आलरेडी एक फेलियर कंसिड़ा कर लिया था जिसके बाद उन्हें उसके उपर एक भी पैसा

खर्च करना वेस्ट लगता था अगर उसके माबाब शंकर को उसके फ्लॉस के साथ

एक्सेप लेकिन अब बहुत

जादा देर हो चकी थी और उसकी हरकतों के कारण, उसकी चोरियों के कारण सोसाइटी ने

उसे एक क्रिमिनल का टैग लगा दिया था और अगर किसी को सोसाइटी में एक

क्रिमिनल का दर्जा दिया जाता है तो उसके आगे बढ़कर क्राइम करने के

चांसेज

इसलिए शंकर और उसका परिवार जैपूर छोड़ कर 1970s के शुरुवात में रजस्थान के

श्री करणपुर में शिफ्ट हो गए अब शंकर 18 साल से उपर का हो चुका था और उसके घरवालों

को लगा कि नई जगा आने के बाद और अपनी पिछली गलतियों से सीख कर शंकर अ

लेकिन ये सिर्फ उनकी एक गलत फैमी थी क्योंकि यहां शिफ्ट होने के बाद भी शंकर

की चोरी की आदत नहीं गई वो अक्सर यहां भी चोरी के मामले में अरस्थ हुआ करता था और

वहां से वो छूट भी जाता था यहां पर भी वो पडोस्य की बीच में काफी जादा

ब�

शंकर का एडिसिजन उसकी खुद की चॉइस से जादा उसकी मुझबूरी थी क्योंकि अब उसकी हरकतों

के कारण सिर्फ उसका ही नहीं बलकि उसके पेरेंस का भी जीना मुश्किल हो गया था शंकर

और उसके पेरेंस के बीच का रिष्टा अब पूरी तरह बिगर चुका था �

पर शंकर के घर छोड़ने के कुछ टाइम बाद ही अचानक खबार आई कि करणपूर के दो घरों में

पांच लोगों की मौत हो गई थी उन पांच लोगों के सर पर किसी भारी वेपन से वार किया गया

था जिसके कारण उनकी मौत हुई थी So this thing confirmed कि उन पांचों का किसी ने

किया था लेकिन पुलिस को इन्वेस्टिगेशन के दौरान यहां पर कोई भी एविडेंस नहीं मिल

पाया जिसके कारण यह एक cold case हो गया था and again guys remember the timeline

हम लोग किस time period की बात कर रहे हैं उस time पर काफी ज़्यादा problem थी

इंडिया में तो इसलिए even though यहां पर लोग वो तो वो भी बहुत बेरहमी से कोई

evidence ना मिल पाने पर पुलिस फालों ने अपने resources कहीं और पर use करें लेकिन

अब धीरे धीरे ऐसे ही similar cases राजस्थान के और भी areas से आने लगे थे

जहांपे लोगों के कान के नीचे चोट हुआ करती थी इसके अलावा इसमें एक और important चीज

यह

का एक दूसरे के साथ कोई भी connection नहीं था पुलिस के पास अब इन murders को

लेकर कोई भी evidence कोई भी proof या फिर कोई भी witness नहीं था लेकिन एक बात तो

यहाँ पर clear थी कि ये सारे के सारे एक ही इंसान ने करे थे ये अब सिर्फ राजिस्तान

तक ही सीमित नहीं थे क्योंकि अब ऐसे cases ह

और लोगों के बीच खौफ का महौल था उस समय और रिमेंबर 1970 का ये वो समय था जब इंडिया

और पाकिस्तान के बीच टेंशन इतनी जादा थी कि ये चीज कभी भी वार के तरफ लीड कर सकती

थी पर एक तरफ जहां पूरा देश पाकिस्तान को लेकर वरिड था

राजिस्थ वार की सिचुएशन के कारण इन केसेस

पर उतना ध्यान भी नहीं दिया जा रहा था जिसकी वज़े से 1971 से लेकर 1973 के बीच

72 लोगों ने अपनी जान गवा दी थी और लोग इन किलिंग्स की इतनी जादा बाते करने लगे थे

कि उन्होंने इस सीरियल किलर को नाम भी दिया था �

रात के समय पे हो रहे थे जिसकी वैसे किसी ने भी कनपटी मार का चेहरा नहीं देखा था डर

के माहूल की वैसे सभी लोगों ने रात में अपने घरों से भार निकलना बंद कर दिया था

और गर्मियों में भी लोग साथ में चिपक के सोय करते थे एक ही कमरे में जैसे ही सूर�

कि नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है बलकि एक दुबला पतला आदमी था जो कि कंबल ओड कर वहाँ आता

था और जैसे ही ये बात सर्वाइबर्स ने बताई वहाँ पे ये बात आग के तरह फैनल लगी थी

जिसके बाद गाउं में या फिर किसी भी छोटे मोटे शहर में अगर

कोई

पर इस कहानी में एक मोर तब आया जब 9th September 1973 को शाहदूल शहर के

गुरुद्वारे में सोरहे तीन केर्टेकर्स के उपर रात के अंधेरे में जान लेवा हमला हो

गया था जिसमें दो केर्टेकर्स की मौत हो गई थी इन तीनों को भी कान के नीचे मारा गया

था जिससे ये बातो

इस खबर को सुनने के वाद वहाँ के आसपास के लोग उस्पेशली सिख कमिनिटे के अंदर डर तो

बैड़ी गया था लेकिन उन्हें बहुत ज़दा एंगर भी था क्योंकि गुरदवारे जैसे पवित्र जगा

में ऐसा हीनस क्राइम हुआ था इसलिए बढ़ते प्रेशर को �

शहदूल या फिर शहदूल शहर गुरुद्वारे पर पहुंचे और क्राइम सीन को एक्जामिन करना

शुरू कर दिया उन्होंने पूरे गुरुद्वारे में फोर्स एंट्री के मल्टिपल साइंस थे

सारा सामान बिखरा पड़ा वा था और सारे लॉक्स भी तोटे वे थे

ऐ

बिखरेवे सामान में पड़ेवे एक टिन बॉक्स पे ब्लडी फिंगर प्रिंट्स के निशान थे और पूरे

गुरतवारे के फ्लोर में उसी परसन के खून में सनेवे फुटप्रिंट के भी निशान थे पुलिस

ने यहां मिले सारे एविडेंसेस को सिक्योर करा और

जैपूर Now, 1970s में इंडिया में

surveillance या फिर forensic bureau ऐसी चीज़ों को ढंग से implement नहीं करा गया

था. So, this was one of the rarest cases जिसमें शुरुवात में एक forensic evidence

को use करा गया था. But still, it did not amount to anything क्योंकि again उस time

पे forensic analysis इतना जादा strong नहीं था इंडिया में. इसलिए पुलिस वालों को

orthodox तरीकों पर rely करना

पड़

रहा उसने एक अंजान आदमी को नाइंथ सेप्टेंबर को उस समय उसने एक अंजान आदमी

को रेलवे स्टेशन की पट्री पर शहधूल शहर की तरफ बढ़ते वे देखा था और अकॉर्डिंग टो दैट

गाय वो आदमी वहां का रहने वाला था ही नहीं क्योंकि एक

छोड़ा

सा तो पता चला कि उस दिन सुबह शहदूल शहर से पंजाब के भटिंडा के लिए एक टिकेट काटी

थी उस इंसान ने इस इंफो से पुलिस को यकीन हो गया था कि जिस किसी ने भी गुरुदवारे

में लोगों को मारा था उसका भटिंडा से जरूर कोई कनेक्शन था क्योंकि �

बटिंडा जैसे बड़े शहर में एक कातिल को ढूंढना almost impossible था and क्योंकि

ये मामला अलग-अलग states का था तो राजिस्थान, हरियाणा, पंजाब की पुलिस का

आपस में ताल मेल नहीं बैट रहा था उनके बीच में proper communication नहीं था जिसकी

वेशे investigation में भी बहुत ज़दा problem आ रही �

लेकिन फिर SP शाम प्रताब ने अपने traditional methods अर्माए और उन्होंने

उन सारे survivors को बुलाया जो कि कनपटी मार से बच चुके थे सभी को अलग-अलग कमरे

में बिठाये गया सब से statement लिया गया और अलग-अलग sketch artist को बुला कर

कनपटी मार का sketch तैयार किया गया और हैरानी के बात यह

और इसे तीनों स्टेट के सारे पुलिस स्टेशन में भेज दिया गया था अब इंवेस्टिगेशन के

एरिया को नैरो डाउन करके सिर्फ उनी जगाओं पर फोकस किया गया जहां पहले भी ये हो चुके

थे नाओ ये चीज मत सोचना की अब क्योंकि कनपटे मार का स्केच बन �

SP शाम सिंग बिना देर किये अपनी टीम के साथ भटिंडा रेलवे स्टेशन पहुँचे और कड़ी

महनत के बाद 3 जुलाई 1974 को भटिंडा रेलवे स्टेशन में रतनलाल नाम के एक आदमी को

किरतार किया गया रतनलाल भटिंडा में रिक्षा चलाया करता था पुलिस ने

उसे पुलिस के उसके उपर का शक यकीन में तब बदला

जब शादूल शहर के एक जमिनदार ने सामने आकर पुलिस को बताया कि रतनलाल एक साल पहले

उसके खेद पर मजदूरी करता था लेकिन उसके चोरी करनी की वज़ा से उससे मार पीट कर

वहां से भगा दिया गया था

फर्द

ऐसे में जब पुलिस ने श्री करणपूर में इनवेसिकेशन किया तो पता चला कि कुछ साल

पहले इस महले में पाँच लोग का उनके कान के नीचे वार करने की वज़े से हुआ था।

जब पुलिस वाला ने इस वारे में रतनलाल से बातचीत करी तो उसने

जो कुछ भी

पुल

और अटैक्स तो इससे भी जादा लोगों पर किया था मैंने पर उन में से कुछ बच निकले

रदलनाल ने ये भी चीज बताये कि कई सारे रिपोर्ट्स तो पुलिस वालों के पास तक भी

नहीं पहुंची थी उसने पुलिस वालों को ये भी बताया कि वो किसी एक वेपन से

ल

जब वो रतनलाल को फर्दर इन्वेस्टिगेशन के लिए श्री करनपुर लेकर पहुँचे तब वहाँ

पहुँचते ही करनपुर के लोगों ने रतनलाल को तुरंत पहचान लिया क्योंकि रतनलाल और कोई

नहीं बल्कि उनका पुराना पडोसी शंकर ही था जो सालों पहले व

एक आई विटनस का कहना था कि जब श्री करणपुर में पुलिस ने रतन लाल उर्फ शंकर से पूछा

कि बता यहां किसे किसे और कैसे मारा था तूने तो इस पर शंकर ने हसते हुए बोला एक

बार मेरे हाथ पैर खोल दो उसके बाद मैं बताता हूँ कि मैंने किस को कैसे कैसे

और वहां से गुरदवारा सिर्फ 5 किमेटर दूर था जहां शंकर ने दो लोगों को मारा था

गुरदवारा पहुँचने के बाद पुलिस की पूछताश में शंकर ने बताया कि कैसे वो गुरदवारा के

अंदर खुसा वहां चोरी की और वहां मौझू तीन केयर टेकर्स को उस

लेकिन उसने ये बड़ी disappointment के साथ कहा कि वहाँ उसे गुरुद्वारे में उसे सिर्फ

19 रुपे मिले थे गुरुद्वारे में ये सारा crime करने के बाद उसने वहीं गुरुद्वारे

के pond से अपना आपको साफ करा वहाँ के pond के पानी से अपना आपको साफ करा और

इसके

बाद

न मनी राम जलप उसका केस लेने के लिए तैयार हुए मनी राम ने अपने इंटरव्यू में बताया

कि कुछ लोगों ने उनसे उसका केस लेने के लिए रिक्वेस्ट करा था और सिंस वो नए नए

लॉयर बने थे तो उन्होंने इसी वज़े से उसका केस लिया था मनी राम ने य

पैसे के लिए मारा करता था पहले तो वो काम करा करता था लेकिन जैसे ही उसे रुपियो

पैसो की जरूत परती थी तो वो किसी भी इंसान के घर के अंदर गुज कर उन्हें मार देता था

फिर वो वहाँ से पैसे लेकर जेवरात लेकर वहाँ से बिना कोई एविडेंस

छोड़

मनिराम ने अपने इंटरव्यू में फर्दर बताया कि जब ये ट्रायल श्री गंगा नगर सेशन कोर्ट

में भौंचा और उन्होंने उसके डिफेंस में प्रोसीडिंग शुरू की तब तक शंकर ने कोर्ट

में अपने सारे क्राइम्स एडमिट कर दिये थे शंकर का कहना था

कि श्री गंगा नगर सेशन

कोर्ट में ट्रायल चला और शंकर के कंफेशन के बाद फाइनली उससे 27 जून 1975 को फांसी

की सजा सुनाई गई पर अपनी फांसी की सजा कम करने के लिए शंकर ने राजिस्थान हाई कोर्ट

में अपील की लेकिन वहां से भी उससे 5th में 1976 को फांसी की स

इसके बाद वो सुप्रीम कोड पहुंचा लेकिन वहाँ से भी उसे फांसी की सजा सुना दी गई

थी और जब उसे कोई विरासा नहीं दिखा तो उसने प्रेसिडेंट को लेटर लिखा कि उसकी सजा

कम कर दे लेकिन उन्होंने भी उसकी सजा को उसकी अपील को डिनाय कर

दिया

और शंकर की सजा 5-6 मैने में ही उससे बता दी गई थी और फाइनल हो गई थी लेकिन फाइनली

16th May 1976 को उसे जैपूर में फांसी दे दी गई फांसी से पहले उसके आकरी वर्ज ये थे

मैंने पेवजा कई लोग की हत्या कर दी अब कोई मेरे जैसा मत बनना कनपट्टी मार

शंक

अब जब आप लोग शंकर के बारे में इतना सब कुछ जान ही चुके हो इतना सब कुछ सुन ही

चुके हो तो आप लोग के दिमाग में भी एक कुशन आया होगा कि क्या वो लोग को सिर्फ

पैसों के लिए मारा करता था और इसका जवाब है नहीं इन्वेस्टिकेशन में

शंकर

मार देता था जो भी उससे पहले दिखता था बस लेकिन उससे मरते वे इस चीज का पस्तावा था

कि उसने इतने सारे लोगों को बिना किसी रीजन के मारा था शंकर का बच्पन उसके इस

साइकॉटिक बिहेवियर को डेवलब करने के पीछे का एक काफी बड़ा रीजन था

उस

अगर आप एक स्ट्रैटेडी

जानते हैं

नहीं है अपने पैसे लगाने के लिए खेलने के लिए then do check my pinned comment in

the comment section below again but with that ये case अभी यहीं पर समापत होता है

and I hope that you guys are happy and healthy please be close to your loved

ones guys and I'll see you very very soon bye bye

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