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00:00:30,240 --> 00:00:33,240
मेरा
2
00:00:35,920 --> 00:00:38,920
लेजान
3
00:00:39,520 --> 00:00:42,520
द
4
00:00:54,239 --> 00:00:57,239
नहीं
5
00:01:14,000 --> 00:01:16,000
अल्लाह
6
00:01:16,000 --> 00:01:19,000
अल्लाह
7
00:01:21,040 --> 00:01:23,280
से
8
00:01:23,280 --> 00:01:25,680
जा
9
00:01:32,479 --> 00:01:35,479
यार
10
00:01:54,320 --> 00:01:57,320
क्या
11
00:02:05,360 --> 00:02:09,000
पहला साहब
12
00:02:15,840 --> 00:02:18,840
हाय
13
00:02:29,280 --> 00:02:32,280
से
14
00:03:02,480 --> 00:03:06,200
अब जा
15
00:03:22,640 --> 00:03:26,200
आपसे मिल
16
00:03:55,519 --> 00:03:58,760
खोल दे
17
00:04:28,960 --> 00:04:31,960
आ
18
00:04:35,120 --> 00:04:37,840
मेरा मामा
19
00:04:37,840 --> 00:04:40,080
आ गए
20
00:04:40,080 --> 00:04:45,160
आर के आ चुने
21
00:04:48,400 --> 00:04:51,400
आ
22
00:04:54,160 --> 00:04:57,160
बे
23
00:05:00,160 --> 00:05:02,720
वही रह जाती है जहां टूटी थी। यूसुफ
24
00:05:02,720 --> 00:05:04,720
मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो जाती
25
00:05:04,720 --> 00:05:07,280
है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता चलता
26
00:05:07,280 --> 00:05:10,000
है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता है।
27
00:05:10,000 --> 00:05:13,600
इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को मालूम
28
00:05:13,600 --> 00:05:15,680
होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर की
29
00:05:15,680 --> 00:05:18,800
सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी नुकसान
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00:05:18,800 --> 00:05:21,520
में है। आलिया दोनों के दरमियान पल बनने
31
00:05:21,520 --> 00:05:23,840
की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर कहती
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00:05:23,840 --> 00:05:26,639
है कि बाज गलतियां सजा नहीं से अब समझ
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00:05:26,639 --> 00:05:29,600
मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर अंदर
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00:05:29,600 --> 00:05:32,000
से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
35
00:05:32,000 --> 00:05:34,960
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
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00:05:34,960 --> 00:05:37,360
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
37
00:05:37,360 --> 00:05:41,520
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
38
00:05:41,520 --> 00:05:43,919
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
39
00:05:43,919 --> 00:05:46,240
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
40
00:05:46,240 --> 00:05:49,039
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
41
00:05:49,039 --> 00:05:51,199
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
42
00:05:51,199 --> 00:05:54,560
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
43
00:05:54,560 --> 00:05:56,960
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
44
00:05:56,960 --> 00:05:59,680
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
45
00:05:59,680 --> 00:06:03,199
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
46
00:06:03,199 --> 00:06:06,240
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
47
00:06:06,240 --> 00:06:08,479
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
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00:06:08,479 --> 00:06:10,639
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
49
00:06:10,639 --> 00:06:13,360
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
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00:06:13,360 --> 00:06:15,840
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
51
00:06:15,840 --> 00:06:18,319
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
52
00:06:18,319 --> 00:06:20,720
ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है
53
00:06:20,720 --> 00:06:23,280
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
54
00:06:23,280 --> 00:06:25,600
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
55
00:06:25,600 --> 00:06:28,479
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
56
00:06:28,479 --> 00:06:32,080
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
57
00:06:32,080 --> 00:06:34,400
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
58
00:06:34,400 --> 00:06:37,120
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
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00:06:37,120 --> 00:06:39,680
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
60
00:06:39,680 --> 00:06:42,240
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
61
00:06:42,240 --> 00:06:44,560
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
62
00:06:44,560 --> 00:06:47,280
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
63
00:06:47,280 --> 00:06:50,240
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
64
00:06:50,240 --> 00:06:52,800
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
65
00:06:52,800 --> 00:06:55,440
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
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00:06:55,440 --> 00:06:58,720
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
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00:06:58,720 --> 00:07:01,120
नाम नहीं बनाता।
68
00:07:01,120 --> 00:07:03,520
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
69
00:07:03,520 --> 00:07:05,840
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
70
00:07:05,840 --> 00:07:08,639
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
71
00:07:08,639 --> 00:07:10,800
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
72
00:07:10,800 --> 00:07:14,160
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
73
00:07:14,160 --> 00:07:16,560
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
74
00:07:16,560 --> 00:07:19,280
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
75
00:07:19,280 --> 00:07:22,800
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
76
00:07:22,800 --> 00:07:25,840
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
77
00:07:25,840 --> 00:07:28,080
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
78
00:07:28,080 --> 00:07:30,240
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
79
00:07:30,240 --> 00:07:32,960
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
80
00:07:32,960 --> 00:07:35,440
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
81
00:07:35,440 --> 00:07:37,919
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
82
00:07:37,919 --> 00:07:40,319
ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है
83
00:07:40,319 --> 00:07:42,880
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
84
00:07:42,880 --> 00:07:45,199
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
85
00:07:45,199 --> 00:07:48,080
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
86
00:07:48,080 --> 00:07:51,680
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
87
00:07:51,680 --> 00:07:54,000
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
88
00:07:54,000 --> 00:07:56,720
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
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00:07:56,720 --> 00:07:59,280
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
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00:07:59,280 --> 00:08:01,840
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
91
00:08:01,840 --> 00:08:04,160
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
92
00:08:04,160 --> 00:08:06,879
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
93
00:08:06,879 --> 00:08:09,840
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
94
00:08:09,840 --> 00:08:12,400
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
95
00:08:12,400 --> 00:08:15,039
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
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00:08:15,039 --> 00:08:18,319
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
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00:08:18,319 --> 00:08:20,720
नाम नहीं बनाता।
98
00:08:20,720 --> 00:08:23,120
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
99
00:08:23,120 --> 00:08:25,440
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
100
00:08:25,440 --> 00:08:28,240
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
101
00:08:28,240 --> 00:08:30,400
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
102
00:08:30,400 --> 00:08:33,760
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
103
00:08:33,760 --> 00:08:36,159
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
104
00:08:36,159 --> 00:08:38,880
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
105
00:08:38,880 --> 00:08:42,399
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
106
00:08:42,399 --> 00:08:45,440
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
107
00:08:45,440 --> 00:08:47,680
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
108
00:08:47,680 --> 00:08:49,839
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
109
00:08:49,839 --> 00:08:52,560
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
110
00:08:52,560 --> 00:08:55,040
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
111
00:08:55,040 --> 00:08:57,519
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
112
00:08:57,519 --> 00:08:59,920
ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है
113
00:08:59,920 --> 00:09:02,480
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
114
00:09:02,480 --> 00:09:04,800
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
115
00:09:04,800 --> 00:09:07,680
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
116
00:09:07,680 --> 00:09:11,279
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
117
00:09:11,279 --> 00:09:13,600
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
118
00:09:13,600 --> 00:09:16,320
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
119
00:09:16,320 --> 00:09:18,880
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
120
00:09:18,880 --> 00:09:21,440
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
121
00:09:21,440 --> 00:09:23,760
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
122
00:09:23,760 --> 00:09:26,480
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
123
00:09:26,480 --> 00:09:29,440
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
124
00:09:29,440 --> 00:09:32,000
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
125
00:09:32,000 --> 00:09:34,560
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
126
00:09:34,560 --> 00:09:37,920
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
127
00:09:37,920 --> 00:09:40,320
नाम नहीं बनाता।
128
00:09:40,320 --> 00:09:42,720
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
129
00:09:42,720 --> 00:09:45,040
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
130
00:09:45,040 --> 00:09:47,839
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
131
00:09:47,839 --> 00:09:50,000
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
132
00:09:50,000 --> 00:09:53,279
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
133
00:09:53,279 --> 00:09:55,760
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
134
00:09:55,760 --> 00:09:58,480
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
135
00:09:58,480 --> 00:10:02,000
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
136
00:10:02,000 --> 00:10:05,040
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
137
00:10:05,040 --> 00:10:07,279
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
138
00:10:07,279 --> 00:10:09,440
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
139
00:10:09,440 --> 00:10:12,160
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
140
00:10:12,160 --> 00:10:15,200
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
141
00:10:15,200 --> 00:10:17,440
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
142
00:10:17,440 --> 00:10:20,320
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
143
00:10:20,320 --> 00:10:22,720
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
144
00:10:22,720 --> 00:10:25,120
हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का
145
00:10:25,120 --> 00:10:27,839
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
146
00:10:27,839 --> 00:10:31,680
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
147
00:10:31,680 --> 00:10:33,440
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
148
00:10:33,440 --> 00:10:36,480
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
149
00:10:36,480 --> 00:10:39,200
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
150
00:10:39,200 --> 00:10:41,600
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
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00:10:41,600 --> 00:10:44,480
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
152
00:10:44,480 --> 00:10:47,279
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है।
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00:10:47,279 --> 00:10:50,240
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
154
00:10:50,240 --> 00:10:52,959
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
155
00:10:52,959 --> 00:10:55,440
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
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00:10:55,440 --> 00:10:59,920
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
157
00:10:59,920 --> 00:11:02,320
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
158
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रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
159
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है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
160
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दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
161
00:11:09,600 --> 00:11:12,880
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
162
00:11:12,880 --> 00:11:15,360
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
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00:11:15,360 --> 00:11:18,079
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
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00:11:18,079 --> 00:11:21,600
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
165
00:11:21,600 --> 00:11:24,640
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
166
00:11:24,640 --> 00:11:26,880
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
167
00:11:26,880 --> 00:11:29,040
हंठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के
168
00:11:29,040 --> 00:11:31,760
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
169
00:11:31,760 --> 00:11:34,800
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
170
00:11:34,800 --> 00:11:37,040
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
171
00:11:37,040 --> 00:11:39,920
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
172
00:11:39,920 --> 00:11:42,320
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
173
00:11:42,320 --> 00:11:44,720
हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का
174
00:11:44,720 --> 00:11:47,440
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
175
00:11:47,440 --> 00:11:51,279
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
176
00:11:51,279 --> 00:11:53,040
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
177
00:11:53,040 --> 00:11:56,079
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
178
00:11:56,079 --> 00:11:58,800
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
179
00:11:58,800 --> 00:12:01,200
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
180
00:12:01,200 --> 00:12:04,079
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
181
00:12:04,079 --> 00:12:06,880
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है।
182
00:12:06,880 --> 00:12:09,839
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
183
00:12:09,839 --> 00:12:12,560
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
184
00:12:12,560 --> 00:12:15,040
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
185
00:12:15,040 --> 00:12:19,519
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
186
00:12:19,519 --> 00:12:21,920
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
187
00:12:21,920 --> 00:12:24,240
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
188
00:12:24,240 --> 00:12:27,040
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
189
00:12:27,040 --> 00:12:29,200
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
190
00:12:29,200 --> 00:12:32,480
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
191
00:12:32,480 --> 00:12:34,959
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
192
00:12:34,959 --> 00:12:37,680
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
193
00:12:37,680 --> 00:12:41,120
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
194
00:12:41,120 --> 00:12:44,160
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
195
00:12:44,160 --> 00:12:46,480
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
196
00:12:46,480 --> 00:12:48,639
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
197
00:12:48,639 --> 00:12:51,279
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
198
00:12:51,279 --> 00:12:54,720
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
199
00:12:54,720 --> 00:12:56,880
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
200
00:12:56,880 --> 00:12:59,920
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
201
00:12:59,920 --> 00:13:02,079
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
202
00:13:02,079 --> 00:13:04,560
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
203
00:13:04,560 --> 00:13:07,279
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
204
00:13:07,279 --> 00:13:10,959
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
205
00:13:10,959 --> 00:13:13,120
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
206
00:13:13,120 --> 00:13:15,920
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
207
00:13:15,920 --> 00:13:18,720
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
208
00:13:18,720 --> 00:13:21,120
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
209
00:13:21,120 --> 00:13:23,839
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
210
00:13:23,839 --> 00:13:26,800
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
211
00:13:26,800 --> 00:13:29,600
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
212
00:13:29,600 --> 00:13:32,480
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
213
00:13:32,480 --> 00:13:34,959
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
214
00:13:34,959 --> 00:13:39,120
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
215
00:13:39,120 --> 00:13:41,440
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
216
00:13:41,440 --> 00:13:43,839
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
217
00:13:43,839 --> 00:13:46,560
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
218
00:13:46,560 --> 00:13:48,800
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
219
00:13:48,800 --> 00:13:52,079
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
220
00:13:52,079 --> 00:13:54,560
रोते हुए कहता है, मैंने तुम्हें निकालकर
221
00:13:54,560 --> 00:13:57,279
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
222
00:13:57,279 --> 00:14:00,720
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
223
00:14:00,720 --> 00:14:03,760
लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से
224
00:14:03,760 --> 00:14:06,079
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
225
00:14:06,079 --> 00:14:08,240
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
226
00:14:08,240 --> 00:14:10,880
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
227
00:14:10,880 --> 00:14:14,320
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
228
00:14:14,320 --> 00:14:16,480
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
229
00:14:16,480 --> 00:14:19,519
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
230
00:14:19,519 --> 00:14:21,680
यूसफु मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
231
00:14:21,680 --> 00:14:24,160
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
232
00:14:24,160 --> 00:14:26,880
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
233
00:14:26,880 --> 00:14:30,560
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
234
00:14:30,560 --> 00:14:32,720
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
235
00:14:32,720 --> 00:14:35,519
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
236
00:14:35,519 --> 00:14:38,320
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
237
00:14:38,320 --> 00:14:40,720
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
238
00:14:40,720 --> 00:14:43,440
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
239
00:14:43,440 --> 00:14:46,399
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
240
00:14:46,399 --> 00:14:49,199
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
241
00:14:49,199 --> 00:14:52,079
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
242
00:14:52,079 --> 00:14:54,560
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
243
00:14:54,560 --> 00:14:58,720
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
244
00:14:58,720 --> 00:15:01,040
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
245
00:15:01,040 --> 00:15:03,440
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
246
00:15:03,440 --> 00:15:06,160
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
247
00:15:06,160 --> 00:15:08,399
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
248
00:15:08,399 --> 00:15:11,680
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
249
00:15:11,680 --> 00:15:14,160
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
250
00:15:14,160 --> 00:15:16,880
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
251
00:15:16,880 --> 00:15:20,320
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
252
00:15:20,320 --> 00:15:23,360
लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से
253
00:15:23,360 --> 00:15:25,680
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
254
00:15:25,680 --> 00:15:27,839
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
255
00:15:27,839 --> 00:15:30,480
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
256
00:15:30,480 --> 00:15:33,920
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
257
00:15:33,920 --> 00:15:36,079
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
258
00:15:36,079 --> 00:15:39,120
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
259
00:15:39,120 --> 00:15:41,279
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
260
00:15:41,279 --> 00:15:43,760
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
261
00:15:43,760 --> 00:15:46,480
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
262
00:15:46,480 --> 00:15:50,160
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
263
00:15:50,160 --> 00:15:52,320
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
264
00:15:52,320 --> 00:15:55,120
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
265
00:15:55,120 --> 00:15:57,920
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
266
00:15:57,920 --> 00:16:00,320
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
267
00:16:00,320 --> 00:16:03,040
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
268
00:16:03,040 --> 00:16:06,000
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
269
00:16:06,000 --> 00:16:08,800
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
270
00:16:08,800 --> 00:16:11,680
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
271
00:16:11,680 --> 00:16:14,160
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
272
00:16:14,160 --> 00:16:18,320
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
273
00:16:18,320 --> 00:16:20,639
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
274
00:16:20,639 --> 00:16:23,040
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
275
00:16:23,040 --> 00:16:25,759
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
276
00:16:25,759 --> 00:16:28,000
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
277
00:16:28,000 --> 00:16:31,279
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
278
00:16:31,279 --> 00:16:33,680
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
279
00:16:33,680 --> 00:16:36,480
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
280
00:16:36,480 --> 00:16:39,920
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
281
00:16:39,920 --> 00:16:42,959
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
282
00:16:42,959 --> 00:16:45,279
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
283
00:16:45,279 --> 00:16:47,440
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
284
00:16:47,440 --> 00:16:50,079
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
285
00:16:50,079 --> 00:16:53,519
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
286
00:16:53,519 --> 00:16:55,680
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
287
00:16:55,680 --> 00:16:58,720
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
288
00:16:58,720 --> 00:17:00,880
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
289
00:17:00,880 --> 00:17:03,360
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
290
00:17:03,360 --> 00:17:06,079
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
291
00:17:06,079 --> 00:17:09,760
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
292
00:17:09,760 --> 00:17:11,919
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
293
00:17:11,919 --> 00:17:14,720
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
294
00:17:14,720 --> 00:17:17,520
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
295
00:17:17,520 --> 00:17:19,919
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
296
00:17:19,919 --> 00:17:22,640
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
297
00:17:22,640 --> 00:17:25,600
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
298
00:17:25,600 --> 00:17:28,400
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
299
00:17:28,400 --> 00:17:31,280
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
300
00:17:31,280 --> 00:17:33,760
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
301
00:17:33,760 --> 00:17:37,919
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
302
00:17:37,919 --> 00:17:40,240
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
303
00:17:40,240 --> 00:17:42,640
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
304
00:17:42,640 --> 00:17:45,360
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
305
00:17:45,360 --> 00:17:47,600
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
306
00:17:47,600 --> 00:17:50,880
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
307
00:17:50,880 --> 00:17:53,280
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
308
00:17:53,280 --> 00:17:56,080
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
309
00:17:56,080 --> 00:17:59,520
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
310
00:17:59,520 --> 00:18:02,559
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
311
00:18:02,559 --> 00:18:04,880
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
312
00:18:04,880 --> 00:18:07,039
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
313
00:18:07,039 --> 00:18:09,679
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
314
00:18:09,679 --> 00:18:13,120
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
315
00:18:13,120 --> 00:18:15,280
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
316
00:18:15,280 --> 00:18:18,320
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
317
00:18:18,320 --> 00:18:20,480
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
318
00:18:20,480 --> 00:18:22,960
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
319
00:18:22,960 --> 00:18:25,679
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
320
00:18:25,679 --> 00:18:29,360
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
321
00:18:29,360 --> 00:18:31,520
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
322
00:18:31,520 --> 00:18:34,320
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
323
00:18:34,320 --> 00:18:37,120
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
324
00:18:37,120 --> 00:18:39,520
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
325
00:18:39,520 --> 00:18:42,240
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
326
00:18:42,240 --> 00:18:45,200
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
327
00:18:45,200 --> 00:18:48,000
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
328
00:18:48,000 --> 00:18:50,880
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
329
00:18:50,880 --> 00:18:53,360
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
330
00:18:53,360 --> 00:18:57,520
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
331
00:18:57,520 --> 00:18:59,840
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
332
00:18:59,840 --> 00:19:02,240
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
333
00:19:02,240 --> 00:19:04,960
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
334
00:19:04,960 --> 00:19:07,200
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
335
00:19:07,200 --> 00:19:10,480
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
336
00:19:10,480 --> 00:19:12,880
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
337
00:19:12,880 --> 00:19:15,679
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
338
00:19:15,679 --> 00:19:19,120
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
339
00:19:19,120 --> 00:19:22,160
लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से
340
00:19:22,160 --> 00:19:24,480
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
341
00:19:24,480 --> 00:19:26,640
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
342
00:19:26,640 --> 00:19:29,280
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
343
00:19:29,280 --> 00:19:32,720
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
344
00:19:32,720 --> 00:19:34,880
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
345
00:19:34,880 --> 00:19:37,919
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
346
00:19:37,919 --> 00:19:40,080
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
347
00:19:40,080 --> 00:19:42,559
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
348
00:19:42,559 --> 00:19:45,280
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
349
00:19:45,280 --> 00:19:48,960
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
350
00:19:48,960 --> 00:19:51,120
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
351
00:19:51,120 --> 00:19:53,919
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
352
00:19:53,919 --> 00:19:56,720
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
353
00:19:56,720 --> 00:19:59,120
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
354
00:19:59,120 --> 00:20:01,840
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
355
00:20:01,840 --> 00:20:04,799
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
356
00:20:04,799 --> 00:20:07,600
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
357
00:20:07,600 --> 00:20:10,480
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
358
00:20:10,480 --> 00:20:12,960
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
359
00:20:12,960 --> 00:20:17,120
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
360
00:20:17,120 --> 00:20:19,440
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
361
00:20:19,440 --> 00:20:21,840
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
362
00:20:21,840 --> 00:20:24,559
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
363
00:20:24,559 --> 00:20:26,799
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
364
00:20:26,799 --> 00:20:30,080
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
365
00:20:30,080 --> 00:20:32,480
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
366
00:20:32,480 --> 00:20:35,280
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
367
00:20:35,280 --> 00:20:38,720
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
368
00:20:38,720 --> 00:20:41,760
लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से
369
00:20:41,760 --> 00:20:44,080
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
370
00:20:44,080 --> 00:20:46,240
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
371
00:20:46,240 --> 00:20:48,880
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
372
00:20:48,880 --> 00:20:52,240
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
373
00:20:52,240 --> 00:20:54,480
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
374
00:20:54,480 --> 00:20:57,520
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
375
00:20:57,520 --> 00:20:59,679
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
376
00:20:59,679 --> 00:21:02,159
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
377
00:21:02,159 --> 00:21:04,880
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
378
00:21:04,880 --> 00:21:08,559
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
379
00:21:08,559 --> 00:21:10,720
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
380
00:21:10,720 --> 00:21:13,520
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
381
00:21:13,520 --> 00:21:16,320
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
382
00:21:16,320 --> 00:21:18,720
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
383
00:21:18,720 --> 00:21:21,440
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
384
00:21:21,440 --> 00:21:24,400
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
385
00:21:24,400 --> 00:21:27,200
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
386
00:21:27,200 --> 00:21:30,080
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
387
00:21:30,080 --> 00:21:32,559
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
388
00:21:32,559 --> 00:21:36,640
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
389
00:21:36,640 --> 00:21:39,039
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
390
00:21:39,039 --> 00:21:41,360
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
391
00:21:41,360 --> 00:21:44,159
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
392
00:21:44,159 --> 00:21:46,400
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
393
00:21:46,400 --> 00:21:49,679
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
394
00:21:49,679 --> 00:21:52,080
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
395
00:21:52,080 --> 00:21:54,799
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
396
00:21:54,799 --> 00:21:58,320
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
397
00:21:58,320 --> 00:22:01,360
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
398
00:22:01,360 --> 00:22:03,679
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
399
00:22:03,679 --> 00:22:05,840
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
400
00:22:05,840 --> 00:22:08,640
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
401
00:22:08,640 --> 00:22:11,520
वो वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
402
00:22:11,520 --> 00:22:13,760
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
403
00:22:13,760 --> 00:22:16,640
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
404
00:22:16,640 --> 00:22:19,039
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
405
00:22:19,039 --> 00:22:21,440
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
406
00:22:21,440 --> 00:22:24,240
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
407
00:22:24,240 --> 00:22:28,000
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
408
00:22:28,000 --> 00:22:29,760
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
409
00:22:29,760 --> 00:22:32,880
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
410
00:22:32,880 --> 00:22:35,520
भी नुकसान में है। अलिया दोनों के दरमियान
411
00:22:35,520 --> 00:22:37,919
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
412
00:22:37,919 --> 00:22:40,799
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
413
00:22:40,799 --> 00:22:43,600
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
414
00:22:43,600 --> 00:22:46,640
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
415
00:22:46,640 --> 00:22:49,280
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
416
00:22:49,280 --> 00:22:51,760
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
417
00:22:51,760 --> 00:22:56,240
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
418
00:22:56,240 --> 00:22:58,640
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
419
00:22:58,640 --> 00:23:00,960
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
420
00:23:00,960 --> 00:23:03,760
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
421
00:23:03,760 --> 00:23:06,000
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
422
00:23:06,000 --> 00:23:09,280
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
423
00:23:09,280 --> 00:23:11,679
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
424
00:23:11,679 --> 00:23:14,400
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
425
00:23:14,400 --> 00:23:17,919
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
426
00:23:17,919 --> 00:23:20,960
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
427
00:23:20,960 --> 00:23:23,280
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
428
00:23:23,280 --> 00:23:25,440
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
429
00:23:25,440 --> 00:23:28,240
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
430
00:23:28,240 --> 00:23:31,120
वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी
431
00:23:31,120 --> 00:23:33,360
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
432
00:23:33,360 --> 00:23:36,240
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
433
00:23:36,240 --> 00:23:38,640
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
434
00:23:38,640 --> 00:23:41,039
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
435
00:23:41,039 --> 00:23:43,840
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
436
00:23:43,840 --> 00:23:47,600
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
437
00:23:47,600 --> 00:23:49,360
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
438
00:23:49,360 --> 00:23:52,480
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
439
00:23:52,480 --> 00:23:55,120
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
440
00:23:55,120 --> 00:23:57,520
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
441
00:23:57,520 --> 00:24:00,400
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
442
00:24:00,400 --> 00:24:03,200
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
443
00:24:03,200 --> 00:24:06,240
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
444
00:24:06,240 --> 00:24:08,880
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
445
00:24:08,880 --> 00:24:11,360
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
446
00:24:11,360 --> 00:24:15,840
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
447
00:24:15,840 --> 00:24:18,240
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
448
00:24:18,240 --> 00:24:20,559
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
449
00:24:20,559 --> 00:24:23,360
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
450
00:24:23,360 --> 00:24:25,600
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
451
00:24:25,600 --> 00:24:28,880
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
452
00:24:28,880 --> 00:24:31,279
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
453
00:24:31,279 --> 00:24:34,000
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
454
00:24:34,000 --> 00:24:37,520
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
455
00:24:37,520 --> 00:24:40,559
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
456
00:24:40,559 --> 00:24:42,880
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
457
00:24:42,880 --> 00:24:44,960
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
458
00:24:44,960 --> 00:24:47,840
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
459
00:24:47,840 --> 00:24:50,720
वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी
460
00:24:50,720 --> 00:24:52,960
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
461
00:24:52,960 --> 00:24:55,840
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
462
00:24:55,840 --> 00:24:58,240
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
463
00:24:58,240 --> 00:25:00,640
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
464
00:25:00,640 --> 00:25:03,360
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
465
00:25:03,360 --> 00:25:07,200
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
466
00:25:07,200 --> 00:25:08,960
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
467
00:25:08,960 --> 00:25:12,080
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
468
00:25:12,080 --> 00:25:14,720
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
469
00:25:14,720 --> 00:25:17,120
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
470
00:25:17,120 --> 00:25:20,000
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
471
00:25:20,000 --> 00:25:22,799
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
472
00:25:22,799 --> 00:25:25,760
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
473
00:25:25,760 --> 00:25:28,480
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
474
00:25:28,480 --> 00:25:30,960
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
475
00:25:30,960 --> 00:25:35,440
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
476
00:25:35,440 --> 00:25:37,840
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
477
00:25:37,840 --> 00:25:40,159
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
478
00:25:40,159 --> 00:25:42,960
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
479
00:25:42,960 --> 00:25:45,200
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
480
00:25:45,200 --> 00:25:48,480
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
481
00:25:48,480 --> 00:25:50,880
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
482
00:25:50,880 --> 00:25:53,600
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
483
00:25:53,600 --> 00:25:57,120
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
484
00:25:57,120 --> 00:26:00,159
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
485
00:26:00,159 --> 00:26:02,480
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
486
00:26:02,480 --> 00:26:04,559
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
487
00:26:04,559 --> 00:26:07,279
इख्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
488
00:26:07,279 --> 00:26:09,760
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
489
00:26:09,760 --> 00:26:12,240
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
490
00:26:12,240 --> 00:26:14,640
ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है
491
00:26:14,640 --> 00:26:17,200
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
492
00:26:17,200 --> 00:26:19,520
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की
493
00:26:19,520 --> 00:26:22,400
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
494
00:26:22,400 --> 00:26:26,000
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
495
00:26:26,000 --> 00:26:28,320
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
496
00:26:28,320 --> 00:26:31,120
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
497
00:26:31,120 --> 00:26:33,600
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
498
00:26:33,600 --> 00:26:36,159
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
499
00:26:36,159 --> 00:26:38,480
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
500
00:26:38,480 --> 00:26:41,200
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
501
00:26:41,200 --> 00:26:44,159
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
502
00:26:44,159 --> 00:26:46,720
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
503
00:26:46,720 --> 00:26:49,360
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
504
00:26:49,360 --> 00:26:52,640
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
505
00:26:52,640 --> 00:26:55,039
नाम नहीं बनाता।
506
00:26:55,039 --> 00:26:57,440
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
507
00:26:57,440 --> 00:26:59,760
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
508
00:26:59,760 --> 00:27:02,559
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
509
00:27:02,559 --> 00:27:04,799
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
510
00:27:04,799 --> 00:27:08,080
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
511
00:27:08,080 --> 00:27:10,480
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
512
00:27:10,480 --> 00:27:13,200
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
513
00:27:13,200 --> 00:27:16,720
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
514
00:27:16,720 --> 00:27:19,760
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
515
00:27:19,760 --> 00:27:22,000
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
516
00:27:22,000 --> 00:27:24,159
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
517
00:27:24,159 --> 00:27:26,880
इख्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
518
00:27:26,880 --> 00:27:29,360
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
519
00:27:29,360 --> 00:27:31,840
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
520
00:27:31,840 --> 00:27:34,240
ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है
521
00:27:34,240 --> 00:27:36,799
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
522
00:27:36,799 --> 00:27:39,120
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की
523
00:27:39,120 --> 00:27:42,000
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
524
00:27:42,000 --> 00:27:45,600
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
525
00:27:45,600 --> 00:27:47,919
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
526
00:27:47,919 --> 00:27:50,640
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
527
00:27:50,640 --> 00:27:53,200
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
528
00:27:53,200 --> 00:27:55,760
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
529
00:27:55,760 --> 00:27:58,080
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
530
00:27:58,080 --> 00:28:00,799
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मनसूर
531
00:28:00,799 --> 00:28:03,760
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
532
00:28:03,760 --> 00:28:06,320
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
533
00:28:06,320 --> 00:28:08,960
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
534
00:28:08,960 --> 00:28:12,240
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
535
00:28:12,240 --> 00:28:14,640
नाम नहीं बनाता।
536
00:28:14,640 --> 00:28:17,039
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
537
00:28:17,039 --> 00:28:19,360
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
538
00:28:19,360 --> 00:28:22,159
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
539
00:28:22,159 --> 00:28:24,320
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
540
00:28:24,320 --> 00:28:27,679
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
541
00:28:27,679 --> 00:28:30,080
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
542
00:28:30,080 --> 00:28:32,799
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
543
00:28:32,799 --> 00:28:36,320
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
544
00:28:36,320 --> 00:28:39,360
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
545
00:28:39,360 --> 00:28:41,600
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
546
00:28:41,600 --> 00:28:43,760
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
547
00:28:43,760 --> 00:28:46,480
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
548
00:28:46,480 --> 00:28:48,960
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
549
00:28:48,960 --> 00:28:51,440
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
550
00:28:51,440 --> 00:28:53,840
ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है
551
00:28:53,840 --> 00:28:56,399
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
552
00:28:56,399 --> 00:28:58,720
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
553
00:28:58,720 --> 00:29:01,600
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
554
00:29:01,600 --> 00:29:05,200
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
555
00:29:05,200 --> 00:29:07,520
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
556
00:29:07,520 --> 00:29:10,240
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
557
00:29:10,240 --> 00:29:12,799
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
558
00:29:12,799 --> 00:29:15,360
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
559
00:29:15,360 --> 00:29:17,679
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
560
00:29:17,679 --> 00:29:20,399
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
561
00:29:20,399 --> 00:29:23,360
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
562
00:29:23,360 --> 00:29:25,919
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
563
00:29:25,919 --> 00:29:28,559
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
564
00:29:28,559 --> 00:29:31,840
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
565
00:29:31,840 --> 00:29:34,240
नाम नहीं बनाता।
566
00:29:34,240 --> 00:29:36,640
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
567
00:29:36,640 --> 00:29:38,960
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
568
00:29:38,960 --> 00:29:41,760
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
569
00:29:41,760 --> 00:29:43,919
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
570
00:29:43,919 --> 00:29:47,279
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
571
00:29:47,279 --> 00:29:49,679
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
572
00:29:49,679 --> 00:29:52,399
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
573
00:29:52,399 --> 00:29:55,919
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
574
00:29:55,919 --> 00:29:58,960
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
575
00:29:58,960 --> 00:30:01,200
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
576
00:30:01,200 --> 00:30:03,360
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
577
00:30:03,360 --> 00:30:06,080
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
578
00:30:06,080 --> 00:30:08,559
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
579
00:30:08,559 --> 00:30:11,039
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
580
00:30:11,039 --> 00:30:13,440
ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है
581
00:30:13,440 --> 00:30:16,000
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
582
00:30:16,000 --> 00:30:18,320
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
583
00:30:18,320 --> 00:30:21,200
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
584
00:30:21,200 --> 00:30:24,799
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
585
00:30:24,799 --> 00:30:27,120
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
586
00:30:27,120 --> 00:30:29,840
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
587
00:30:29,840 --> 00:30:32,399
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
588
00:30:32,399 --> 00:30:34,960
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
589
00:30:34,960 --> 00:30:37,279
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
590
00:30:37,279 --> 00:30:40,000
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
591
00:30:40,000 --> 00:30:42,960
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
592
00:30:42,960 --> 00:30:45,520
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
593
00:30:45,520 --> 00:30:48,159
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
594
00:30:48,159 --> 00:30:51,440
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
595
00:30:51,440 --> 00:30:53,840
नाम नहीं बनाता।
596
00:30:53,840 --> 00:30:56,240
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
597
00:30:56,240 --> 00:30:58,559
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
598
00:30:58,559 --> 00:31:01,360
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
599
00:31:01,360 --> 00:31:03,520
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
600
00:31:03,520 --> 00:31:06,799
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
601
00:31:06,799 --> 00:31:09,279
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
602
00:31:09,279 --> 00:31:12,000
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
603
00:31:12,000 --> 00:31:15,520
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
604
00:31:15,520 --> 00:31:18,559
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
605
00:31:18,559 --> 00:31:20,799
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
606
00:31:20,799 --> 00:31:22,960
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
607
00:31:22,960 --> 00:31:25,679
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
608
00:31:25,679 --> 00:31:28,159
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
609
00:31:28,159 --> 00:31:30,640
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
610
00:31:30,640 --> 00:31:33,039
ड्रामा सेल के हवाले से वहीं रह जाती है
611
00:31:33,039 --> 00:31:35,600
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
612
00:31:35,600 --> 00:31:37,919
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
613
00:31:37,919 --> 00:31:40,799
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
614
00:31:40,799 --> 00:31:44,399
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
615
00:31:44,399 --> 00:31:46,720
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
616
00:31:46,720 --> 00:31:49,440
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
617
00:31:49,440 --> 00:31:52,000
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
618
00:31:52,000 --> 00:31:54,559
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
619
00:31:54,559 --> 00:31:56,880
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
620
00:31:56,880 --> 00:31:59,600
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
621
00:31:59,600 --> 00:32:02,559
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
622
00:32:02,559 --> 00:32:05,120
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
623
00:32:05,120 --> 00:32:07,679
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
624
00:32:07,679 --> 00:32:11,039
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
625
00:32:11,039 --> 00:32:13,440
नाम नहीं बनाता।
626
00:32:13,440 --> 00:32:15,840
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
627
00:32:15,840 --> 00:32:18,159
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
628
00:32:18,159 --> 00:32:20,960
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
629
00:32:20,960 --> 00:32:23,120
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
630
00:32:23,120 --> 00:32:26,399
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
631
00:32:26,399 --> 00:32:28,880
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
632
00:32:28,880 --> 00:32:31,600
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
633
00:32:31,600 --> 00:32:35,120
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
634
00:32:35,120 --> 00:32:38,159
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
635
00:32:38,159 --> 00:32:40,399
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
636
00:32:40,399 --> 00:32:42,559
हंठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
637
00:32:42,559 --> 00:32:45,279
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
638
00:32:45,279 --> 00:32:48,320
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
639
00:32:48,320 --> 00:32:50,559
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
640
00:32:50,559 --> 00:32:52,960
सेल के हवाले से वहीं रह जाती है जहां
641
00:32:52,960 --> 00:32:55,200
टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
642
00:32:55,200 --> 00:32:57,519
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
643
00:32:57,519 --> 00:33:00,399
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
644
00:33:00,399 --> 00:33:04,000
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
645
00:33:04,000 --> 00:33:06,320
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
646
00:33:06,320 --> 00:33:09,039
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
647
00:33:09,039 --> 00:33:11,600
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
648
00:33:11,600 --> 00:33:14,159
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
649
00:33:14,159 --> 00:33:16,480
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
650
00:33:16,480 --> 00:33:19,200
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
651
00:33:19,200 --> 00:33:22,159
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
652
00:33:22,159 --> 00:33:24,720
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
653
00:33:24,720 --> 00:33:27,279
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
654
00:33:27,279 --> 00:33:30,640
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
655
00:33:30,640 --> 00:33:33,039
नाम नहीं बनाता।
656
00:33:33,039 --> 00:33:35,440
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
657
00:33:35,440 --> 00:33:37,760
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
658
00:33:37,760 --> 00:33:40,559
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
659
00:33:40,559 --> 00:33:42,720
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
660
00:33:42,720 --> 00:33:46,000
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
661
00:33:46,000 --> 00:33:48,480
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
662
00:33:48,480 --> 00:33:51,200
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
663
00:33:51,200 --> 00:33:54,720
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
664
00:33:54,720 --> 00:33:57,760
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
665
00:33:57,760 --> 00:34:00,000
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
666
00:34:00,000 --> 00:34:02,159
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
667
00:34:02,159 --> 00:34:05,200
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
668
00:34:05,200 --> 00:34:08,480
वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद
669
00:34:08,480 --> 00:34:10,480
की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
670
00:34:10,480 --> 00:34:13,440
हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी।
671
00:34:13,440 --> 00:34:15,599
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
672
00:34:15,599 --> 00:34:18,079
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
673
00:34:18,079 --> 00:34:20,879
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
674
00:34:20,879 --> 00:34:24,480
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
675
00:34:24,480 --> 00:34:26,720
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
676
00:34:26,720 --> 00:34:29,440
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
677
00:34:29,440 --> 00:34:32,320
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
678
00:34:32,320 --> 00:34:34,639
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
679
00:34:34,639 --> 00:34:37,359
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से अब
680
00:34:37,359 --> 00:34:40,320
समझ मांगती है। मनसूर खामोश रहता है। मगर
681
00:34:40,320 --> 00:34:43,119
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
682
00:34:43,119 --> 00:34:46,079
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
683
00:34:46,079 --> 00:34:48,480
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
684
00:34:48,480 --> 00:34:52,639
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
685
00:34:52,639 --> 00:34:55,040
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
686
00:34:55,040 --> 00:34:57,359
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
687
00:34:57,359 --> 00:35:00,160
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
688
00:35:00,160 --> 00:35:02,320
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
689
00:35:02,320 --> 00:35:05,599
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
690
00:35:05,599 --> 00:35:08,079
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
691
00:35:08,079 --> 00:35:10,800
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
692
00:35:10,800 --> 00:35:14,320
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
693
00:35:14,320 --> 00:35:17,359
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
694
00:35:17,359 --> 00:35:19,599
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
695
00:35:19,599 --> 00:35:21,760
होठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के
696
00:35:21,760 --> 00:35:24,480
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
697
00:35:24,480 --> 00:35:27,839
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
698
00:35:27,839 --> 00:35:30,079
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
699
00:35:30,079 --> 00:35:33,040
हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी।
700
00:35:33,040 --> 00:35:35,200
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
701
00:35:35,200 --> 00:35:37,680
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
702
00:35:37,680 --> 00:35:40,480
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
703
00:35:40,480 --> 00:35:44,079
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
704
00:35:44,079 --> 00:35:46,320
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
705
00:35:46,320 --> 00:35:49,040
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
706
00:35:49,040 --> 00:35:51,839
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
707
00:35:51,839 --> 00:35:54,240
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
708
00:35:54,240 --> 00:35:56,960
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से अब
709
00:35:56,960 --> 00:35:59,920
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर
710
00:35:59,920 --> 00:36:02,720
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
711
00:36:02,720 --> 00:36:05,680
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
712
00:36:05,680 --> 00:36:08,079
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
713
00:36:08,079 --> 00:36:12,240
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
714
00:36:12,240 --> 00:36:14,640
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
715
00:36:14,640 --> 00:36:16,960
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
716
00:36:16,960 --> 00:36:19,760
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
717
00:36:19,760 --> 00:36:21,920
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
718
00:36:21,920 --> 00:36:25,200
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
719
00:36:25,200 --> 00:36:27,680
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
720
00:36:27,680 --> 00:36:30,320
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
721
00:36:30,320 --> 00:36:33,839
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
722
00:36:33,839 --> 00:36:36,880
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
723
00:36:36,880 --> 00:36:39,119
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
724
00:36:39,119 --> 00:36:41,280
होठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के
725
00:36:41,280 --> 00:36:44,000
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
726
00:36:44,000 --> 00:36:47,040
है। वो वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी
727
00:36:47,040 --> 00:36:49,280
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
728
00:36:49,280 --> 00:36:51,680
सेल के हवाले से वहीं रह जाती है जहां
729
00:36:51,680 --> 00:36:53,920
टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
730
00:36:53,920 --> 00:36:56,240
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
731
00:36:56,240 --> 00:36:59,119
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
732
00:36:59,119 --> 00:37:02,800
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
733
00:37:02,800 --> 00:37:05,040
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
734
00:37:05,040 --> 00:37:07,839
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
735
00:37:07,839 --> 00:37:10,400
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
736
00:37:10,400 --> 00:37:12,960
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
737
00:37:12,960 --> 00:37:15,280
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
738
00:37:15,280 --> 00:37:18,000
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
739
00:37:18,000 --> 00:37:20,960
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
740
00:37:20,960 --> 00:37:23,520
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
741
00:37:23,520 --> 00:37:26,079
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
742
00:37:26,079 --> 00:37:29,440
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
743
00:37:29,440 --> 00:37:31,760
नाम नहीं बनाता।
744
00:37:31,760 --> 00:37:34,160
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
745
00:37:34,160 --> 00:37:36,480
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
746
00:37:36,480 --> 00:37:39,280
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
747
00:37:39,280 --> 00:37:41,440
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
748
00:37:41,440 --> 00:37:44,720
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
749
00:37:44,720 --> 00:37:47,200
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
750
00:37:47,200 --> 00:37:50,000
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
751
00:37:50,000 --> 00:37:53,520
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
752
00:37:53,520 --> 00:37:56,560
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
753
00:37:56,560 --> 00:37:58,800
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
754
00:37:58,800 --> 00:38:00,960
होठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के
755
00:38:00,960 --> 00:38:03,839
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
756
00:38:03,839 --> 00:38:06,720
वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी
757
00:38:06,720 --> 00:38:08,960
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
758
00:38:08,960 --> 00:38:11,359
सेल के हवाले से वहीं रह जाती है जहां
759
00:38:11,359 --> 00:38:13,599
टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
760
00:38:13,599 --> 00:38:15,920
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
761
00:38:15,920 --> 00:38:18,800
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
762
00:38:18,800 --> 00:38:22,400
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
763
00:38:22,400 --> 00:38:24,640
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
764
00:38:24,640 --> 00:38:27,440
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
765
00:38:27,440 --> 00:38:30,000
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
766
00:38:30,000 --> 00:38:32,560
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
767
00:38:32,560 --> 00:38:34,880
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
768
00:38:34,880 --> 00:38:37,599
सजा नहीं सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर
769
00:38:37,599 --> 00:38:40,560
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
770
00:38:40,560 --> 00:38:43,119
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
771
00:38:43,119 --> 00:38:45,680
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
772
00:38:45,680 --> 00:38:49,040
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
773
00:38:49,040 --> 00:38:51,440
नाम नहीं बनाता।
774
00:38:51,440 --> 00:38:53,760
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
775
00:38:53,760 --> 00:38:56,160
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
776
00:38:56,160 --> 00:38:58,960
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
777
00:38:58,960 --> 00:39:01,119
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
778
00:39:01,119 --> 00:39:04,400
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
779
00:39:04,400 --> 00:39:06,880
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
780
00:39:06,880 --> 00:39:09,599
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
781
00:39:09,599 --> 00:39:13,119
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
782
00:39:13,119 --> 00:39:16,160
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
783
00:39:16,160 --> 00:39:18,400
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
784
00:39:18,400 --> 00:39:20,560
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
785
00:39:20,560 --> 00:39:23,599
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
786
00:39:23,599 --> 00:39:26,640
वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
787
00:39:26,640 --> 00:39:28,880
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
788
00:39:28,880 --> 00:39:31,920
हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी।
789
00:39:31,920 --> 00:39:34,000
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
790
00:39:34,000 --> 00:39:36,480
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
791
00:39:36,480 --> 00:39:39,280
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
792
00:39:39,280 --> 00:39:42,880
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
793
00:39:42,880 --> 00:39:45,119
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
794
00:39:45,119 --> 00:39:47,839
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
795
00:39:47,839 --> 00:39:50,640
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
796
00:39:50,640 --> 00:39:53,040
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
797
00:39:53,040 --> 00:39:55,760
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब
798
00:39:55,760 --> 00:39:58,720
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर
799
00:39:58,720 --> 00:40:01,520
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
800
00:40:01,520 --> 00:40:04,480
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
801
00:40:04,480 --> 00:40:06,880
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
802
00:40:06,880 --> 00:40:11,040
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
803
00:40:11,040 --> 00:40:13,359
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
804
00:40:13,359 --> 00:40:15,760
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
805
00:40:15,760 --> 00:40:18,560
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
806
00:40:18,560 --> 00:40:20,720
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
807
00:40:20,720 --> 00:40:24,000
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
808
00:40:24,000 --> 00:40:26,480
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
809
00:40:26,480 --> 00:40:29,200
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
810
00:40:29,200 --> 00:40:32,720
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
811
00:40:32,720 --> 00:40:35,760
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
812
00:40:35,760 --> 00:40:38,000
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
813
00:40:38,000 --> 00:40:40,160
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
814
00:40:40,160 --> 00:40:43,200
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
815
00:40:43,200 --> 00:40:46,480
वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद
816
00:40:46,480 --> 00:40:48,480
की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
817
00:40:48,480 --> 00:40:51,440
हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी।
818
00:40:51,440 --> 00:40:53,599
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
819
00:40:53,599 --> 00:40:56,079
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
820
00:40:56,079 --> 00:40:58,880
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
821
00:40:58,880 --> 00:41:02,400
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
822
00:41:02,400 --> 00:41:04,640
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
823
00:41:04,640 --> 00:41:07,359
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
824
00:41:07,359 --> 00:41:10,160
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
825
00:41:10,160 --> 00:41:12,560
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
826
00:41:12,560 --> 00:41:15,280
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब
827
00:41:15,280 --> 00:41:18,240
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर
828
00:41:18,240 --> 00:41:21,040
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
829
00:41:21,040 --> 00:41:24,000
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
830
00:41:24,000 --> 00:41:26,400
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
831
00:41:26,400 --> 00:41:30,640
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
832
00:41:30,640 --> 00:41:32,960
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
833
00:41:32,960 --> 00:41:35,359
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
834
00:41:35,359 --> 00:41:38,160
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
835
00:41:38,160 --> 00:41:40,319
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
836
00:41:40,319 --> 00:41:43,599
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
837
00:41:43,599 --> 00:41:46,079
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
838
00:41:46,079 --> 00:41:48,720
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
839
00:41:48,720 --> 00:41:52,240
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
840
00:41:52,240 --> 00:41:55,280
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
841
00:41:55,280 --> 00:41:57,520
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
842
00:41:57,520 --> 00:41:59,680
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
843
00:41:59,680 --> 00:42:02,720
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
844
00:42:02,720 --> 00:42:05,440
वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
845
00:42:05,440 --> 00:42:07,680
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
846
00:42:07,680 --> 00:42:10,560
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
847
00:42:10,560 --> 00:42:13,040
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
848
00:42:13,040 --> 00:42:15,440
हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का
849
00:42:15,440 --> 00:42:18,160
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
850
00:42:18,160 --> 00:42:22,000
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
851
00:42:22,000 --> 00:42:23,760
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
852
00:42:23,760 --> 00:42:26,800
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
853
00:42:26,800 --> 00:42:29,520
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
854
00:42:29,520 --> 00:42:31,920
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
855
00:42:31,920 --> 00:42:34,480
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
856
00:42:34,480 --> 00:42:37,280
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
857
00:42:37,280 --> 00:42:40,319
है। मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने
858
00:42:40,319 --> 00:42:43,119
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
859
00:42:43,119 --> 00:42:45,359
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
860
00:42:45,359 --> 00:42:50,160
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
861
00:42:50,160 --> 00:42:52,480
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
862
00:42:52,480 --> 00:42:54,880
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
863
00:42:54,880 --> 00:42:57,680
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
864
00:42:57,680 --> 00:42:59,839
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
865
00:42:59,839 --> 00:43:03,119
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
866
00:43:03,119 --> 00:43:05,599
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
867
00:43:05,599 --> 00:43:08,400
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
868
00:43:08,400 --> 00:43:11,920
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
869
00:43:11,920 --> 00:43:14,960
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
870
00:43:14,960 --> 00:43:17,200
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
871
00:43:17,200 --> 00:43:19,359
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
872
00:43:19,359 --> 00:43:22,400
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
873
00:43:22,400 --> 00:43:25,119
वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
874
00:43:25,119 --> 00:43:27,359
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
875
00:43:27,359 --> 00:43:30,240
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
876
00:43:30,240 --> 00:43:32,560
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
877
00:43:32,560 --> 00:43:34,960
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
878
00:43:34,960 --> 00:43:37,680
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
879
00:43:37,680 --> 00:43:41,599
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
880
00:43:41,599 --> 00:43:43,359
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
881
00:43:43,359 --> 00:43:46,400
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
882
00:43:46,400 --> 00:43:49,119
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
883
00:43:49,119 --> 00:43:51,520
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
884
00:43:51,520 --> 00:43:54,079
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
885
00:43:54,079 --> 00:43:56,880
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
886
00:43:56,880 --> 00:43:59,920
है। मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने
887
00:43:59,920 --> 00:44:02,720
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
888
00:44:02,720 --> 00:44:04,960
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
889
00:44:04,960 --> 00:44:09,839
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
890
00:44:09,839 --> 00:44:12,160
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
891
00:44:12,160 --> 00:44:14,560
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
892
00:44:14,560 --> 00:44:17,359
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
893
00:44:17,359 --> 00:44:19,520
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
894
00:44:19,520 --> 00:44:22,800
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
895
00:44:22,800 --> 00:44:25,280
रोते हुए कहता है, मैंने तुम्हें निकालकर
896
00:44:25,280 --> 00:44:28,000
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
897
00:44:28,000 --> 00:44:31,520
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
898
00:44:31,520 --> 00:44:34,560
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
899
00:44:34,560 --> 00:44:36,800
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
900
00:44:36,800 --> 00:44:38,960
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
901
00:44:38,960 --> 00:44:42,000
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
902
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वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद
903
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की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
904
00:44:47,280 --> 00:44:50,240
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
905
00:44:50,240 --> 00:44:52,400
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
906
00:44:52,400 --> 00:44:54,880
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
907
00:44:54,880 --> 00:44:57,680
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
908
00:44:57,680 --> 00:45:01,280
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
909
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मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
910
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की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
911
00:45:06,240 --> 00:45:09,040
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
912
00:45:09,040 --> 00:45:11,440
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
913
00:45:11,440 --> 00:45:14,160
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब
914
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समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
915
00:45:17,119 --> 00:45:19,920
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
916
00:45:19,920 --> 00:45:22,800
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
917
00:45:22,800 --> 00:45:25,280
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
918
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कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
919
00:45:29,440 --> 00:45:31,760
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
920
00:45:31,760 --> 00:45:34,160
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
921
00:45:34,160 --> 00:45:36,880
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
922
00:45:36,880 --> 00:45:39,119
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
923
00:45:39,119 --> 00:45:42,400
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
924
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रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
925
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खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
926
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मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
927
00:45:51,119 --> 00:45:54,160
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
928
00:45:54,160 --> 00:45:56,400
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
929
00:45:56,400 --> 00:45:58,560
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
930
00:45:58,560 --> 00:46:01,599
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
931
00:46:01,599 --> 00:46:04,640
वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
932
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खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
933
00:46:06,800 --> 00:46:09,839
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
934
00:46:09,839 --> 00:46:12,000
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
935
00:46:12,000 --> 00:46:14,480
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
936
00:46:14,480 --> 00:46:17,280
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
937
00:46:17,280 --> 00:46:20,880
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
938
00:46:20,880 --> 00:46:23,040
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
939
00:46:23,040 --> 00:46:25,839
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
940
00:46:25,839 --> 00:46:28,640
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
941
00:46:28,640 --> 00:46:31,040
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
942
00:46:31,040 --> 00:46:33,760
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
943
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समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
944
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अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
945
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कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
946
00:46:42,400 --> 00:46:44,880
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
947
00:46:44,880 --> 00:46:49,040
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
948
00:46:49,040 --> 00:46:51,359
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
949
00:46:51,359 --> 00:46:53,760
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
950
00:46:53,760 --> 00:46:56,480
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
951
00:46:56,480 --> 00:46:58,720
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
952
00:46:58,720 --> 00:47:02,000
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
953
00:47:02,000 --> 00:47:04,480
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
954
00:47:04,480 --> 00:47:07,200
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
955
00:47:07,200 --> 00:47:10,720
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
956
00:47:10,720 --> 00:47:13,680
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
957
00:47:13,680 --> 00:47:16,000
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
958
00:47:16,000 --> 00:47:18,160
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
959
00:47:18,160 --> 00:47:21,200
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
960
00:47:21,200 --> 00:47:24,480
वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद
961
00:47:24,480 --> 00:47:26,400
की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
962
00:47:26,400 --> 00:47:29,440
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
963
00:47:29,440 --> 00:47:31,599
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
964
00:47:31,599 --> 00:47:34,079
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
965
00:47:34,079 --> 00:47:36,880
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
966
00:47:36,880 --> 00:47:40,480
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
967
00:47:40,480 --> 00:47:42,640
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
968
00:47:42,640 --> 00:47:45,440
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
969
00:47:45,440 --> 00:47:48,240
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
970
00:47:48,240 --> 00:47:50,640
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
971
00:47:50,640 --> 00:47:53,359
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
972
00:47:53,359 --> 00:47:56,319
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
973
00:47:56,319 --> 00:47:59,119
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
974
00:47:59,119 --> 00:48:02,000
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
975
00:48:02,000 --> 00:48:04,480
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
976
00:48:04,480 --> 00:48:08,640
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
977
00:48:08,640 --> 00:48:10,960
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
978
00:48:10,960 --> 00:48:13,359
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
979
00:48:13,359 --> 00:48:16,079
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
980
00:48:16,079 --> 00:48:18,319
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
981
00:48:18,319 --> 00:48:21,599
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
982
00:48:21,599 --> 00:48:24,079
रोते हुए कहता है, मैंने तुम्हें निकालकर
983
00:48:24,079 --> 00:48:26,800
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
984
00:48:26,800 --> 00:48:30,319
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
985
00:48:30,319 --> 00:48:33,280
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
986
00:48:33,280 --> 00:48:35,599
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
987
00:48:35,599 --> 00:48:37,760
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
988
00:48:37,760 --> 00:48:40,800
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
989
00:48:40,800 --> 00:48:44,079
वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद
990
00:48:44,079 --> 00:48:46,000
की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
991
00:48:46,000 --> 00:48:49,040
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
992
00:48:49,040 --> 00:48:51,200
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
993
00:48:51,200 --> 00:48:53,680
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
994
00:48:53,680 --> 00:48:56,480
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
995
00:48:56,480 --> 00:49:00,079
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
996
00:49:00,079 --> 00:49:02,240
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
997
00:49:02,240 --> 00:49:05,040
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
998
00:49:05,040 --> 00:49:07,839
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
999
00:49:07,839 --> 00:49:10,240
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1000
00:49:10,240 --> 00:49:12,960
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
1001
00:49:12,960 --> 00:49:15,920
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
1002
00:49:15,920 --> 00:49:18,720
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1003
00:49:18,720 --> 00:49:21,599
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1004
00:49:21,599 --> 00:49:24,079
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1005
00:49:24,079 --> 00:49:28,240
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1006
00:49:28,240 --> 00:49:30,559
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1007
00:49:30,559 --> 00:49:32,960
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1008
00:49:32,960 --> 00:49:35,680
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1009
00:49:35,680 --> 00:49:37,920
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1010
00:49:37,920 --> 00:49:41,200
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1011
00:49:41,200 --> 00:49:43,680
रोते हुए कहता है, मैंने तुम्हें निकालकर
1012
00:49:43,680 --> 00:49:46,400
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1013
00:49:46,400 --> 00:49:49,839
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1014
00:49:49,839 --> 00:49:52,880
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1015
00:49:52,880 --> 00:49:55,200
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1016
00:49:55,200 --> 00:49:57,359
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1017
00:49:57,359 --> 00:50:00,400
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1018
00:50:00,400 --> 00:50:03,680
वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद
1019
00:50:03,680 --> 00:50:05,599
की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1020
00:50:05,599 --> 00:50:08,640
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
1021
00:50:08,640 --> 00:50:10,800
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1022
00:50:10,800 --> 00:50:13,280
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
1023
00:50:13,280 --> 00:50:16,000
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1024
00:50:16,000 --> 00:50:19,680
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1025
00:50:19,680 --> 00:50:21,839
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1026
00:50:21,839 --> 00:50:24,640
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1027
00:50:24,640 --> 00:50:27,440
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1028
00:50:27,440 --> 00:50:29,839
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1029
00:50:29,839 --> 00:50:32,559
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब
1030
00:50:32,559 --> 00:50:35,520
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
1031
00:50:35,520 --> 00:50:38,319
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1032
00:50:38,319 --> 00:50:41,200
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1033
00:50:41,200 --> 00:50:43,680
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1034
00:50:43,680 --> 00:50:47,839
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1035
00:50:47,839 --> 00:50:50,160
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1036
00:50:50,160 --> 00:50:52,559
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1037
00:50:52,559 --> 00:50:55,280
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1038
00:50:55,280 --> 00:50:57,520
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1039
00:50:57,520 --> 00:51:00,800
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1040
00:51:00,800 --> 00:51:03,280
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1041
00:51:03,280 --> 00:51:06,000
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1042
00:51:06,000 --> 00:51:09,440
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1043
00:51:09,440 --> 00:51:12,480
लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से
1044
00:51:12,480 --> 00:51:14,800
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1045
00:51:14,800 --> 00:51:16,960
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1046
00:51:16,960 --> 00:51:20,000
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1047
00:51:20,000 --> 00:51:23,280
वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद
1048
00:51:23,280 --> 00:51:25,200
की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1049
00:51:25,200 --> 00:51:28,240
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
1050
00:51:28,240 --> 00:51:30,400
यूसफु मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1051
00:51:30,400 --> 00:51:32,880
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
1052
00:51:32,880 --> 00:51:35,599
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1053
00:51:35,599 --> 00:51:39,280
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1054
00:51:39,280 --> 00:51:41,440
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1055
00:51:41,440 --> 00:51:44,240
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1056
00:51:44,240 --> 00:51:47,040
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1057
00:51:47,040 --> 00:51:49,440
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1058
00:51:49,440 --> 00:51:52,160
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
1059
00:51:52,160 --> 00:51:55,119
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
1060
00:51:55,119 --> 00:51:57,920
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1061
00:51:57,920 --> 00:52:00,800
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1062
00:52:00,800 --> 00:52:03,280
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1063
00:52:03,280 --> 00:52:07,440
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1064
00:52:07,440 --> 00:52:09,760
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1065
00:52:09,760 --> 00:52:12,160
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1066
00:52:12,160 --> 00:52:14,880
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1067
00:52:14,880 --> 00:52:17,119
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1068
00:52:17,119 --> 00:52:20,400
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1069
00:52:20,400 --> 00:52:22,880
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1070
00:52:22,880 --> 00:52:25,599
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1071
00:52:25,599 --> 00:52:29,040
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1072
00:52:29,040 --> 00:52:32,079
लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से
1073
00:52:32,079 --> 00:52:34,400
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1074
00:52:34,400 --> 00:52:36,559
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1075
00:52:36,559 --> 00:52:39,200
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1076
00:52:39,200 --> 00:52:42,640
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
1077
00:52:42,640 --> 00:52:44,800
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1078
00:52:44,800 --> 00:52:47,839
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
1079
00:52:47,839 --> 00:52:50,000
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1080
00:52:50,000 --> 00:52:52,480
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
1081
00:52:52,480 --> 00:52:55,200
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1082
00:52:55,200 --> 00:52:58,880
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1083
00:52:58,880 --> 00:53:01,040
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1084
00:53:01,040 --> 00:53:03,839
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1085
00:53:03,839 --> 00:53:06,640
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1086
00:53:06,640 --> 00:53:09,040
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1087
00:53:09,040 --> 00:53:11,760
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
1088
00:53:11,760 --> 00:53:14,720
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
1089
00:53:14,720 --> 00:53:17,520
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1090
00:53:17,520 --> 00:53:20,400
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1091
00:53:20,400 --> 00:53:22,880
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1092
00:53:22,880 --> 00:53:27,040
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1093
00:53:27,040 --> 00:53:29,359
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1094
00:53:29,359 --> 00:53:31,760
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1095
00:53:31,760 --> 00:53:34,480
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1096
00:53:34,480 --> 00:53:36,720
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1097
00:53:36,720 --> 00:53:40,000
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1098
00:53:40,000 --> 00:53:42,480
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1099
00:53:42,480 --> 00:53:45,200
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1100
00:53:45,200 --> 00:53:48,640
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1101
00:53:48,640 --> 00:53:51,680
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1102
00:53:51,680 --> 00:53:54,000
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1103
00:53:54,000 --> 00:53:56,160
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1104
00:53:56,160 --> 00:53:59,200
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1105
00:53:59,200 --> 00:54:02,480
वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद
1106
00:54:02,480 --> 00:54:04,400
की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1107
00:54:04,400 --> 00:54:07,440
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
1108
00:54:07,440 --> 00:54:09,599
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1109
00:54:09,599 --> 00:54:12,079
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
1110
00:54:12,079 --> 00:54:14,800
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1111
00:54:14,800 --> 00:54:18,480
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1112
00:54:18,480 --> 00:54:20,640
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1113
00:54:20,640 --> 00:54:23,440
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1114
00:54:23,440 --> 00:54:26,240
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1115
00:54:26,240 --> 00:54:28,640
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1116
00:54:28,640 --> 00:54:31,359
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
1117
00:54:31,359 --> 00:54:34,319
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
1118
00:54:34,319 --> 00:54:37,119
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
1119
00:54:37,119 --> 00:54:40,000
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1120
00:54:40,000 --> 00:54:42,480
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1121
00:54:42,480 --> 00:54:46,640
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1122
00:54:46,640 --> 00:54:48,960
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1123
00:54:48,960 --> 00:54:51,359
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1124
00:54:51,359 --> 00:54:54,079
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1125
00:54:54,079 --> 00:54:56,319
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1126
00:54:56,319 --> 00:54:59,599
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1127
00:54:59,599 --> 00:55:02,000
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1128
00:55:02,000 --> 00:55:04,800
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1129
00:55:04,800 --> 00:55:08,240
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1130
00:55:08,240 --> 00:55:11,280
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1131
00:55:11,280 --> 00:55:13,599
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1132
00:55:13,599 --> 00:55:15,760
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1133
00:55:15,760 --> 00:55:18,400
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1134
00:55:18,400 --> 00:55:21,839
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
1135
00:55:21,839 --> 00:55:24,000
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1136
00:55:24,000 --> 00:55:27,040
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
1137
00:55:27,040 --> 00:55:29,200
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1138
00:55:29,200 --> 00:55:31,680
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
1139
00:55:31,680 --> 00:55:34,400
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1140
00:55:34,400 --> 00:55:38,079
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1141
00:55:38,079 --> 00:55:40,240
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1142
00:55:40,240 --> 00:55:43,040
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1143
00:55:43,040 --> 00:55:45,839
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1144
00:55:45,839 --> 00:55:48,240
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1145
00:55:48,240 --> 00:55:50,960
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
1146
00:55:50,960 --> 00:55:53,920
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
1147
00:55:53,920 --> 00:55:56,720
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
1148
00:55:56,720 --> 00:55:59,599
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1149
00:55:59,599 --> 00:56:02,079
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1150
00:56:02,079 --> 00:56:06,240
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1151
00:56:06,240 --> 00:56:08,559
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1152
00:56:08,559 --> 00:56:10,960
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1153
00:56:10,960 --> 00:56:13,680
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1154
00:56:13,680 --> 00:56:15,920
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1155
00:56:15,920 --> 00:56:19,200
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1156
00:56:19,200 --> 00:56:21,599
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1157
00:56:21,599 --> 00:56:24,400
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1158
00:56:24,400 --> 00:56:27,839
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1159
00:56:27,839 --> 00:56:30,880
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1160
00:56:30,880 --> 00:56:33,200
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1161
00:56:33,200 --> 00:56:35,359
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1162
00:56:35,359 --> 00:56:38,000
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1163
00:56:38,000 --> 00:56:41,119
है। वापसी से घर की नहीं होती। कभी-कभी
1164
00:56:41,119 --> 00:56:43,359
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1165
00:56:43,359 --> 00:56:46,160
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1166
00:56:46,160 --> 00:56:48,640
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1167
00:56:48,640 --> 00:56:51,040
हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का
1168
00:56:51,040 --> 00:56:53,760
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1169
00:56:53,760 --> 00:56:57,520
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1170
00:56:57,520 --> 00:56:59,359
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1171
00:56:59,359 --> 00:57:02,400
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1172
00:57:02,400 --> 00:57:05,040
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1173
00:57:05,040 --> 00:57:07,520
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1174
00:57:07,520 --> 00:57:10,079
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
1175
00:57:10,079 --> 00:57:13,200
सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
1176
00:57:13,200 --> 00:57:15,920
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
1177
00:57:15,920 --> 00:57:18,720
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
1178
00:57:18,720 --> 00:57:20,960
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
1179
00:57:20,960 --> 00:57:25,839
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1180
00:57:25,839 --> 00:57:28,160
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1181
00:57:28,160 --> 00:57:30,559
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1182
00:57:30,559 --> 00:57:33,280
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1183
00:57:33,280 --> 00:57:35,520
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1184
00:57:35,520 --> 00:57:38,799
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1185
00:57:38,799 --> 00:57:41,200
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1186
00:57:41,200 --> 00:57:44,000
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1187
00:57:44,000 --> 00:57:47,440
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1188
00:57:47,440 --> 00:57:50,480
लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से
1189
00:57:50,480 --> 00:57:52,799
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1190
00:57:52,799 --> 00:57:54,960
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1191
00:57:54,960 --> 00:57:57,599
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1192
00:57:57,599 --> 00:58:01,040
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
1193
00:58:01,040 --> 00:58:03,200
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1194
00:58:03,200 --> 00:58:06,240
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
1195
00:58:06,240 --> 00:58:08,400
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1196
00:58:08,400 --> 00:58:10,880
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
1197
00:58:10,880 --> 00:58:13,599
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1198
00:58:13,599 --> 00:58:17,280
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1199
00:58:17,280 --> 00:58:19,440
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1200
00:58:19,440 --> 00:58:22,240
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1201
00:58:22,240 --> 00:58:25,040
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1202
00:58:25,040 --> 00:58:27,440
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1203
00:58:27,440 --> 00:58:30,160
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
1204
00:58:30,160 --> 00:58:33,119
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
1205
00:58:33,119 --> 00:58:35,920
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
1206
00:58:35,920 --> 00:58:38,799
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1207
00:58:38,799 --> 00:58:41,280
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1208
00:58:41,280 --> 00:58:45,440
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1209
00:58:45,440 --> 00:58:47,760
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1210
00:58:47,760 --> 00:58:50,160
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1211
00:58:50,160 --> 00:58:52,880
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1212
00:58:52,880 --> 00:58:55,119
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1213
00:58:55,119 --> 00:58:58,400
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1214
00:58:58,400 --> 00:59:00,799
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1215
00:59:00,799 --> 00:59:03,599
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1216
00:59:03,599 --> 00:59:07,040
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1217
00:59:07,040 --> 00:59:10,079
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1218
00:59:10,079 --> 00:59:12,319
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1219
00:59:12,319 --> 00:59:14,559
हंठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1220
00:59:14,559 --> 00:59:17,200
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1221
00:59:17,200 --> 00:59:20,240
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
1222
00:59:20,240 --> 00:59:22,559
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1223
00:59:22,559 --> 00:59:25,359
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1224
00:59:25,359 --> 00:59:27,839
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1225
00:59:27,839 --> 00:59:30,240
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1226
00:59:30,240 --> 00:59:32,960
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1227
00:59:32,960 --> 00:59:36,720
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1228
00:59:36,720 --> 00:59:38,559
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1229
00:59:38,559 --> 00:59:41,599
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1230
00:59:41,599 --> 00:59:44,240
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1231
00:59:44,240 --> 00:59:46,720
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1232
00:59:46,720 --> 00:59:49,280
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
1233
00:59:49,280 --> 00:59:52,400
सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
1234
00:59:52,400 --> 00:59:55,119
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
1235
00:59:55,119 --> 00:59:57,920
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
1236
00:59:57,920 --> 01:00:00,160
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
1237
01:00:00,160 --> 01:00:05,040
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1238
01:00:05,040 --> 01:00:07,359
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1239
01:00:07,359 --> 01:00:09,760
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1240
01:00:09,760 --> 01:00:12,480
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1241
01:00:12,480 --> 01:00:14,720
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1242
01:00:14,720 --> 01:00:18,000
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1243
01:00:18,000 --> 01:00:20,400
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1244
01:00:20,400 --> 01:00:23,200
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1245
01:00:23,200 --> 01:00:26,640
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1246
01:00:26,640 --> 01:00:29,680
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1247
01:00:29,680 --> 01:00:32,000
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1248
01:00:32,000 --> 01:00:34,160
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1249
01:00:34,160 --> 01:00:36,799
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1250
01:00:36,799 --> 01:00:40,160
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
1251
01:00:40,160 --> 01:00:42,400
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1252
01:00:42,400 --> 01:00:45,440
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
1253
01:00:45,440 --> 01:00:47,520
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1254
01:00:47,520 --> 01:00:50,079
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
1255
01:00:50,079 --> 01:00:52,799
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1256
01:00:52,799 --> 01:00:56,480
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1257
01:00:56,480 --> 01:00:58,640
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1258
01:00:58,640 --> 01:01:01,440
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1259
01:01:01,440 --> 01:01:04,240
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1260
01:01:04,240 --> 01:01:06,640
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1261
01:01:06,640 --> 01:01:09,359
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
1262
01:01:09,359 --> 01:01:12,319
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
1263
01:01:12,319 --> 01:01:15,119
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
1264
01:01:15,119 --> 01:01:18,000
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1265
01:01:18,000 --> 01:01:20,480
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1266
01:01:20,480 --> 01:01:24,640
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1267
01:01:24,640 --> 01:01:26,960
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1268
01:01:26,960 --> 01:01:29,359
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1269
01:01:29,359 --> 01:01:32,079
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1270
01:01:32,079 --> 01:01:34,319
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1271
01:01:34,319 --> 01:01:37,599
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1272
01:01:37,599 --> 01:01:40,000
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1273
01:01:40,000 --> 01:01:42,799
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1274
01:01:42,799 --> 01:01:46,240
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1275
01:01:46,240 --> 01:01:49,280
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1276
01:01:49,280 --> 01:01:51,599
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1277
01:01:51,599 --> 01:01:53,760
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1278
01:01:53,760 --> 01:01:56,400
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1279
01:01:56,400 --> 01:01:59,440
है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
1280
01:01:59,440 --> 01:02:01,760
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1281
01:02:01,760 --> 01:02:04,559
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1282
01:02:04,559 --> 01:02:06,960
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1283
01:02:06,960 --> 01:02:09,440
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1284
01:02:09,440 --> 01:02:12,160
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1285
01:02:12,160 --> 01:02:15,920
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1286
01:02:15,920 --> 01:02:17,760
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1287
01:02:17,760 --> 01:02:20,799
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1288
01:02:20,799 --> 01:02:23,440
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1289
01:02:23,440 --> 01:02:25,920
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1290
01:02:25,920 --> 01:02:28,480
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
1291
01:02:28,480 --> 01:02:31,599
सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
1292
01:02:31,599 --> 01:02:34,319
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
1293
01:02:34,319 --> 01:02:37,119
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
1294
01:02:37,119 --> 01:02:39,359
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
1295
01:02:39,359 --> 01:02:44,240
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1296
01:02:44,240 --> 01:02:46,559
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1297
01:02:46,559 --> 01:02:48,880
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1298
01:02:48,880 --> 01:02:51,680
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1299
01:02:51,680 --> 01:02:53,920
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1300
01:02:53,920 --> 01:02:57,200
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1301
01:02:57,200 --> 01:02:59,599
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1302
01:02:59,599 --> 01:03:02,319
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1303
01:03:02,319 --> 01:03:05,839
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1304
01:03:05,839 --> 01:03:08,880
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1305
01:03:08,880 --> 01:03:11,200
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1306
01:03:11,200 --> 01:03:13,359
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1307
01:03:13,359 --> 01:03:16,000
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1308
01:03:16,000 --> 01:03:19,039
है। वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी
1309
01:03:19,039 --> 01:03:21,359
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1310
01:03:21,359 --> 01:03:24,160
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1311
01:03:24,160 --> 01:03:26,559
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1312
01:03:26,559 --> 01:03:28,960
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1313
01:03:28,960 --> 01:03:31,760
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1314
01:03:31,760 --> 01:03:35,520
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1315
01:03:35,520 --> 01:03:37,359
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1316
01:03:37,359 --> 01:03:40,400
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1317
01:03:40,400 --> 01:03:43,039
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1318
01:03:43,039 --> 01:03:45,520
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1319
01:03:45,520 --> 01:03:48,079
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
1320
01:03:48,079 --> 01:03:51,200
सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
1321
01:03:51,200 --> 01:03:53,920
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
1322
01:03:53,920 --> 01:03:56,640
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
1323
01:03:56,640 --> 01:03:58,960
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
1324
01:03:58,960 --> 01:04:03,839
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1325
01:04:03,839 --> 01:04:06,160
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1326
01:04:06,160 --> 01:04:08,480
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1327
01:04:08,480 --> 01:04:11,280
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1328
01:04:11,280 --> 01:04:13,520
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1329
01:04:13,520 --> 01:04:16,799
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1330
01:04:16,799 --> 01:04:19,200
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1331
01:04:19,200 --> 01:04:21,920
खुद को सजा दी थी। युसुफ जवाब देता है और
1332
01:04:21,920 --> 01:04:25,440
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1333
01:04:25,440 --> 01:04:28,480
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1334
01:04:28,480 --> 01:04:30,799
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1335
01:04:30,799 --> 01:04:32,960
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1336
01:04:32,960 --> 01:04:35,599
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1337
01:04:35,599 --> 01:04:38,640
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
1338
01:04:38,640 --> 01:04:40,880
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1339
01:04:40,880 --> 01:04:43,760
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1340
01:04:43,760 --> 01:04:46,160
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1341
01:04:46,160 --> 01:04:48,559
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1342
01:04:48,559 --> 01:04:51,359
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1343
01:04:51,359 --> 01:04:55,119
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1344
01:04:55,119 --> 01:04:56,960
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1345
01:04:56,960 --> 01:05:00,000
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1346
01:05:00,000 --> 01:05:02,640
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1347
01:05:02,640 --> 01:05:05,119
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1348
01:05:05,119 --> 01:05:07,680
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
1349
01:05:07,680 --> 01:05:10,400
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
1350
01:05:10,400 --> 01:05:13,520
है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
1351
01:05:13,520 --> 01:05:16,240
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
1352
01:05:16,240 --> 01:05:18,559
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
1353
01:05:18,559 --> 01:05:23,440
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1354
01:05:23,440 --> 01:05:25,760
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1355
01:05:25,760 --> 01:05:28,079
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1356
01:05:28,079 --> 01:05:30,880
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1357
01:05:30,880 --> 01:05:33,119
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1358
01:05:33,119 --> 01:05:36,400
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1359
01:05:36,400 --> 01:05:38,799
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1360
01:05:38,799 --> 01:05:41,520
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1361
01:05:41,520 --> 01:05:45,039
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1362
01:05:45,039 --> 01:05:48,079
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1363
01:05:48,079 --> 01:05:50,400
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1364
01:05:50,400 --> 01:05:52,559
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1365
01:05:52,559 --> 01:05:55,200
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1366
01:05:55,200 --> 01:05:58,240
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
1367
01:05:58,240 --> 01:06:00,480
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1368
01:06:00,480 --> 01:06:03,359
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1369
01:06:03,359 --> 01:06:05,760
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1370
01:06:05,760 --> 01:06:08,160
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1371
01:06:08,160 --> 01:06:10,960
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1372
01:06:10,960 --> 01:06:14,720
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1373
01:06:14,720 --> 01:06:16,559
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1374
01:06:16,559 --> 01:06:19,599
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1375
01:06:19,599 --> 01:06:22,240
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1376
01:06:22,240 --> 01:06:24,720
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1377
01:06:24,720 --> 01:06:27,280
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
1378
01:06:27,280 --> 01:06:30,000
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
1379
01:06:30,000 --> 01:06:33,119
है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
1380
01:06:33,119 --> 01:06:35,839
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
1381
01:06:35,839 --> 01:06:38,160
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
1382
01:06:38,160 --> 01:06:43,039
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1383
01:06:43,039 --> 01:06:45,359
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1384
01:06:45,359 --> 01:06:47,680
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1385
01:06:47,680 --> 01:06:50,480
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1386
01:06:50,480 --> 01:06:52,720
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1387
01:06:52,720 --> 01:06:56,000
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1388
01:06:56,000 --> 01:06:58,400
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1389
01:06:58,400 --> 01:07:01,119
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1390
01:07:01,119 --> 01:07:04,640
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1391
01:07:04,640 --> 01:07:07,680
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1392
01:07:07,680 --> 01:07:10,000
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1393
01:07:10,000 --> 01:07:12,160
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1394
01:07:12,160 --> 01:07:14,799
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1395
01:07:14,799 --> 01:07:17,839
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
1396
01:07:17,839 --> 01:07:20,079
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1397
01:07:20,079 --> 01:07:22,960
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1398
01:07:22,960 --> 01:07:25,359
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1399
01:07:25,359 --> 01:07:27,760
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1400
01:07:27,760 --> 01:07:30,559
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1401
01:07:30,559 --> 01:07:34,319
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1402
01:07:34,319 --> 01:07:36,160
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1403
01:07:36,160 --> 01:07:39,200
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1404
01:07:39,200 --> 01:07:41,839
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1405
01:07:41,839 --> 01:07:44,319
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1406
01:07:44,319 --> 01:07:46,880
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
1407
01:07:46,880 --> 01:07:49,599
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
1408
01:07:49,599 --> 01:07:52,720
है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
1409
01:07:52,720 --> 01:07:55,440
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
1410
01:07:55,440 --> 01:07:57,760
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
1411
01:07:57,760 --> 01:08:02,640
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1412
01:08:02,640 --> 01:08:04,960
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1413
01:08:04,960 --> 01:08:07,280
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1414
01:08:07,280 --> 01:08:10,079
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1415
01:08:10,079 --> 01:08:12,319
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1416
01:08:12,319 --> 01:08:15,599
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1417
01:08:15,599 --> 01:08:18,000
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1418
01:08:18,000 --> 01:08:20,719
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1419
01:08:20,719 --> 01:08:24,239
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1420
01:08:24,239 --> 01:08:27,279
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1421
01:08:27,279 --> 01:08:29,600
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1422
01:08:29,600 --> 01:08:31,759
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1423
01:08:31,759 --> 01:08:34,400
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1424
01:08:34,400 --> 01:08:37,440
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
1425
01:08:37,440 --> 01:08:39,759
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1426
01:08:39,759 --> 01:08:42,560
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1427
01:08:42,560 --> 01:08:44,960
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1428
01:08:44,960 --> 01:08:47,359
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1429
01:08:47,359 --> 01:08:50,159
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1430
01:08:50,159 --> 01:08:53,920
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1431
01:08:53,920 --> 01:08:55,759
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1432
01:08:55,759 --> 01:08:58,799
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1433
01:08:58,799 --> 01:09:01,440
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1434
01:09:01,440 --> 01:09:03,920
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1435
01:09:03,920 --> 01:09:06,719
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
1436
01:09:06,719 --> 01:09:09,600
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
1437
01:09:09,600 --> 01:09:12,319
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
1438
01:09:12,319 --> 01:09:15,040
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
1439
01:09:15,040 --> 01:09:17,359
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
1440
01:09:17,359 --> 01:09:22,239
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1441
01:09:22,239 --> 01:09:24,560
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1442
01:09:24,560 --> 01:09:26,880
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1443
01:09:26,880 --> 01:09:29,679
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1444
01:09:29,679 --> 01:09:31,920
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1445
01:09:31,920 --> 01:09:35,199
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1446
01:09:35,199 --> 01:09:37,600
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1447
01:09:37,600 --> 01:09:40,319
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1448
01:09:40,319 --> 01:09:43,839
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1449
01:09:43,839 --> 01:09:46,880
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1450
01:09:46,880 --> 01:09:49,199
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1451
01:09:49,199 --> 01:09:51,359
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1452
01:09:51,359 --> 01:09:54,000
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1453
01:09:54,000 --> 01:09:57,040
है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
1454
01:09:57,040 --> 01:09:59,280
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1455
01:09:59,280 --> 01:10:02,159
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1456
01:10:02,159 --> 01:10:04,560
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1457
01:10:04,560 --> 01:10:06,960
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1458
01:10:06,960 --> 01:10:09,760
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1459
01:10:09,760 --> 01:10:13,520
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1460
01:10:13,520 --> 01:10:15,360
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1461
01:10:15,360 --> 01:10:18,400
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1462
01:10:18,400 --> 01:10:21,040
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1463
01:10:21,040 --> 01:10:23,440
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1464
01:10:23,440 --> 01:10:26,320
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
1465
01:10:26,320 --> 01:10:29,120
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
1466
01:10:29,120 --> 01:10:31,920
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
1467
01:10:31,920 --> 01:10:34,640
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
1468
01:10:34,640 --> 01:10:36,960
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
1469
01:10:36,960 --> 01:10:41,760
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1470
01:10:41,760 --> 01:10:44,159
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1471
01:10:44,159 --> 01:10:46,480
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1472
01:10:46,480 --> 01:10:49,280
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1473
01:10:49,280 --> 01:10:51,520
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1474
01:10:51,520 --> 01:10:54,800
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1475
01:10:54,800 --> 01:10:57,199
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1476
01:10:57,199 --> 01:10:59,920
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1477
01:10:59,920 --> 01:11:03,440
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1478
01:11:03,440 --> 01:11:06,480
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1479
01:11:06,480 --> 01:11:08,800
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1480
01:11:08,800 --> 01:11:10,960
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1481
01:11:10,960 --> 01:11:14,000
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1482
01:11:14,000 --> 01:11:16,640
वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
1483
01:11:16,640 --> 01:11:18,880
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1484
01:11:18,880 --> 01:11:21,760
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1485
01:11:21,760 --> 01:11:24,159
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1486
01:11:24,159 --> 01:11:26,560
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1487
01:11:26,560 --> 01:11:29,360
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1488
01:11:29,360 --> 01:11:33,120
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1489
01:11:33,120 --> 01:11:34,960
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1490
01:11:34,960 --> 01:11:38,000
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1491
01:11:38,000 --> 01:11:40,640
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1492
01:11:40,640 --> 01:11:43,040
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1493
01:11:43,040 --> 01:11:45,920
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
1494
01:11:45,920 --> 01:11:48,719
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
1495
01:11:48,719 --> 01:11:51,760
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
1496
01:11:51,760 --> 01:11:54,400
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
1497
01:11:54,400 --> 01:11:56,880
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
1498
01:11:56,880 --> 01:12:01,280
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1499
01:12:01,280 --> 01:12:03,679
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1500
01:12:03,679 --> 01:12:06,000
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1501
01:12:06,000 --> 01:12:08,800
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1502
01:12:08,800 --> 01:12:11,040
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1503
01:12:11,040 --> 01:12:14,320
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1504
01:12:14,320 --> 01:12:16,719
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1505
01:12:16,719 --> 01:12:19,520
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1506
01:12:19,520 --> 01:12:23,040
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1507
01:12:23,040 --> 01:12:26,080
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1508
01:12:26,080 --> 01:12:28,400
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1509
01:12:28,400 --> 01:12:30,560
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1510
01:12:30,560 --> 01:12:33,600
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1511
01:12:33,600 --> 01:12:36,239
वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
1512
01:12:36,239 --> 01:12:38,480
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1513
01:12:38,480 --> 01:12:41,360
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1514
01:12:41,360 --> 01:12:43,760
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1515
01:12:43,760 --> 01:12:46,159
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1516
01:12:46,159 --> 01:12:48,960
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1517
01:12:48,960 --> 01:12:52,719
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1518
01:12:52,719 --> 01:12:54,560
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1519
01:12:54,560 --> 01:12:57,600
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1520
01:12:57,600 --> 01:13:00,239
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1521
01:13:00,239 --> 01:13:02,640
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1522
01:13:02,640 --> 01:13:05,520
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
1523
01:13:05,520 --> 01:13:08,320
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
1524
01:13:08,320 --> 01:13:11,360
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
1525
01:13:11,360 --> 01:13:14,000
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
1526
01:13:14,000 --> 01:13:16,480
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
1527
01:13:16,480 --> 01:13:20,960
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1528
01:13:20,960 --> 01:13:23,360
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1529
01:13:23,360 --> 01:13:25,679
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1530
01:13:25,679 --> 01:13:28,480
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1531
01:13:28,480 --> 01:13:30,719
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1532
01:13:30,719 --> 01:13:34,000
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1533
01:13:34,000 --> 01:13:36,400
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1534
01:13:36,400 --> 01:13:39,120
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1535
01:13:39,120 --> 01:13:42,640
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1536
01:13:42,640 --> 01:13:45,679
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1537
01:13:45,679 --> 01:13:47,920
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1538
01:13:47,920 --> 01:13:50,159
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1539
01:13:50,159 --> 01:13:53,199
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1540
01:13:53,199 --> 01:13:56,159
वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
1541
01:13:56,159 --> 01:13:58,400
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1542
01:13:58,400 --> 01:14:01,360
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
1543
01:14:01,360 --> 01:14:03,440
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1544
01:14:03,440 --> 01:14:05,920
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
1545
01:14:05,920 --> 01:14:08,719
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1546
01:14:08,719 --> 01:14:12,400
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1547
01:14:12,400 --> 01:14:14,640
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1548
01:14:14,640 --> 01:14:17,360
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1549
01:14:17,360 --> 01:14:20,239
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान फल
1550
01:14:20,239 --> 01:14:22,640
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1551
01:14:22,640 --> 01:14:25,679
कहती है कि बाज गलत सजा नहीं से अब समझ
1552
01:14:25,679 --> 01:14:28,640
मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर अंदर
1553
01:14:28,640 --> 01:14:31,120
से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1554
01:14:31,120 --> 01:14:34,000
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1555
01:14:34,000 --> 01:14:36,480
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1556
01:14:36,480 --> 01:14:40,560
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1557
01:14:40,560 --> 01:14:42,960
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1558
01:14:42,960 --> 01:14:45,280
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1559
01:14:45,280 --> 01:14:48,080
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1560
01:14:48,080 --> 01:14:50,320
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1561
01:14:50,320 --> 01:14:53,600
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1562
01:14:53,600 --> 01:14:56,000
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1563
01:14:56,000 --> 01:14:58,719
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1564
01:14:58,719 --> 01:15:02,239
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1565
01:15:02,239 --> 01:15:05,280
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1566
01:15:05,280 --> 01:15:07,600
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1567
01:15:07,600 --> 01:15:09,760
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1568
01:15:09,760 --> 01:15:12,560
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1569
01:15:12,560 --> 01:15:15,440
वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी
1570
01:15:15,440 --> 01:15:17,679
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1571
01:15:17,679 --> 01:15:20,560
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1572
01:15:20,560 --> 01:15:22,960
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1573
01:15:22,960 --> 01:15:25,360
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1574
01:15:25,360 --> 01:15:28,159
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1575
01:15:28,159 --> 01:15:31,920
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1576
01:15:31,920 --> 01:15:33,760
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1577
01:15:33,760 --> 01:15:36,800
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1578
01:15:36,800 --> 01:15:39,440
भी नुकसान में है। अलिया दोनों के दरमियान
1579
01:15:39,440 --> 01:15:41,840
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1580
01:15:41,840 --> 01:15:44,719
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
1581
01:15:44,719 --> 01:15:47,520
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
1582
01:15:47,520 --> 01:15:50,560
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
1583
01:15:50,560 --> 01:15:53,199
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
1584
01:15:53,199 --> 01:15:55,679
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
1585
01:15:55,679 --> 01:16:00,159
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1586
01:16:00,159 --> 01:16:02,560
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1587
01:16:02,560 --> 01:16:04,880
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1588
01:16:04,880 --> 01:16:07,679
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1589
01:16:07,679 --> 01:16:09,920
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1590
01:16:09,920 --> 01:16:13,199
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1591
01:16:13,199 --> 01:16:15,600
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1592
01:16:15,600 --> 01:16:18,239
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1593
01:16:18,239 --> 01:16:21,760
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1594
01:16:21,760 --> 01:16:24,800
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1595
01:16:24,800 --> 01:16:27,120
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1596
01:16:27,120 --> 01:16:29,280
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1597
01:16:29,280 --> 01:16:32,080
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1598
01:16:32,080 --> 01:16:34,960
वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी
1599
01:16:34,960 --> 01:16:37,199
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1600
01:16:37,199 --> 01:16:40,080
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1601
01:16:40,080 --> 01:16:42,719
थी। यू मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1602
01:16:42,719 --> 01:16:45,199
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
1603
01:16:45,199 --> 01:16:48,000
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1604
01:16:48,000 --> 01:16:51,600
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1605
01:16:51,600 --> 01:16:53,840
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1606
01:16:53,840 --> 01:16:56,560
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1607
01:16:56,560 --> 01:16:59,440
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1608
01:16:59,440 --> 01:17:01,760
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1609
01:17:01,760 --> 01:17:04,480
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से अब
1610
01:17:04,480 --> 01:17:07,520
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
1611
01:17:07,520 --> 01:17:10,239
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1612
01:17:10,239 --> 01:17:13,199
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1613
01:17:13,199 --> 01:17:15,600
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1614
01:17:15,600 --> 01:17:19,760
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1615
01:17:19,760 --> 01:17:22,159
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1616
01:17:22,159 --> 01:17:24,480
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1617
01:17:24,480 --> 01:17:27,280
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1618
01:17:27,280 --> 01:17:29,520
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1619
01:17:29,520 --> 01:17:32,800
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1620
01:17:32,800 --> 01:17:35,199
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1621
01:17:35,199 --> 01:17:37,920
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1622
01:17:37,920 --> 01:17:41,440
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1623
01:17:41,440 --> 01:17:44,480
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1624
01:17:44,480 --> 01:17:46,800
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
1625
01:17:46,800 --> 01:17:48,880
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1626
01:17:48,880 --> 01:17:51,760
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1627
01:17:51,760 --> 01:17:54,640
वो वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
1628
01:17:54,640 --> 01:17:56,880
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1629
01:17:56,880 --> 01:17:59,760
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1630
01:17:59,760 --> 01:18:02,159
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1631
01:18:02,159 --> 01:18:04,560
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1632
01:18:04,560 --> 01:18:07,360
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1633
01:18:07,360 --> 01:18:11,120
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1634
01:18:11,120 --> 01:18:12,880
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1635
01:18:12,880 --> 01:18:16,000
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1636
01:18:16,000 --> 01:18:18,640
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1637
01:18:18,640 --> 01:18:21,040
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1638
01:18:21,040 --> 01:18:23,920
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
1639
01:18:23,920 --> 01:18:26,719
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है।
1640
01:18:26,719 --> 01:18:29,679
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
1641
01:18:29,679 --> 01:18:32,400
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
1642
01:18:32,400 --> 01:18:34,880
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
1643
01:18:34,880 --> 01:18:39,360
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1644
01:18:39,360 --> 01:18:41,760
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
1645
01:18:41,760 --> 01:18:44,080
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1646
01:18:44,080 --> 01:18:46,880
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1647
01:18:46,880 --> 01:18:49,120
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1648
01:18:49,120 --> 01:18:52,400
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1649
01:18:52,400 --> 01:18:54,800
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1650
01:18:54,800 --> 01:18:57,520
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1651
01:18:57,520 --> 01:19:01,040
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1652
01:19:01,040 --> 01:19:04,080
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1653
01:19:04,080 --> 01:19:06,320
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1654
01:19:06,320 --> 01:19:08,480
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1655
01:19:08,480 --> 01:19:11,199
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1656
01:19:11,199 --> 01:19:13,679
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
1657
01:19:13,679 --> 01:19:16,159
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
1658
01:19:16,159 --> 01:19:18,560
ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है
1659
01:19:18,560 --> 01:19:21,120
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
1660
01:19:21,120 --> 01:19:23,440
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की
1661
01:19:23,440 --> 01:19:26,320
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
1662
01:19:26,320 --> 01:19:29,920
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
1663
01:19:29,920 --> 01:19:32,239
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
1664
01:19:32,239 --> 01:19:35,040
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
1665
01:19:35,040 --> 01:19:37,520
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
1666
01:19:37,520 --> 01:19:40,080
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
1667
01:19:40,080 --> 01:19:42,719
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलत सजा
1668
01:19:42,719 --> 01:19:45,679
नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश
1669
01:19:45,679 --> 01:19:48,880
रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ
1670
01:19:48,880 --> 01:19:51,520
अपने बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया
1671
01:19:51,520 --> 01:19:53,840
तौर पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के
1672
01:19:53,840 --> 01:19:57,280
जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं
1673
01:19:57,280 --> 01:19:58,960
बनाता।
1674
01:19:58,960 --> 01:20:01,360
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1675
01:20:01,360 --> 01:20:03,679
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1676
01:20:03,679 --> 01:20:06,480
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1677
01:20:06,480 --> 01:20:08,719
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1678
01:20:08,719 --> 01:20:12,000
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1679
01:20:12,000 --> 01:20:14,400
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1680
01:20:14,400 --> 01:20:17,120
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1681
01:20:17,120 --> 01:20:20,640
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1682
01:20:20,640 --> 01:20:23,679
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1683
01:20:23,679 --> 01:20:25,920
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1684
01:20:25,920 --> 01:20:28,080
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1685
01:20:28,080 --> 01:20:30,800
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1686
01:20:30,800 --> 01:20:33,840
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
1687
01:20:33,840 --> 01:20:36,080
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1688
01:20:36,080 --> 01:20:38,960
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1689
01:20:38,960 --> 01:20:41,360
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1690
01:20:41,360 --> 01:20:43,760
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
1691
01:20:43,760 --> 01:20:46,480
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1692
01:20:46,480 --> 01:20:50,239
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1693
01:20:50,239 --> 01:20:52,000
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1694
01:20:52,000 --> 01:20:55,120
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1695
01:20:55,120 --> 01:20:57,760
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1696
01:20:57,760 --> 01:21:00,159
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1697
01:21:00,159 --> 01:21:03,199
मिलकर कहती है कि बाज गलत सजा नहीं से अब
1698
01:21:03,199 --> 01:21:06,239
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर
1699
01:21:06,239 --> 01:21:08,960
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1700
01:21:08,960 --> 01:21:11,920
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1701
01:21:11,920 --> 01:21:14,320
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1702
01:21:14,320 --> 01:21:18,560
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1703
01:21:18,560 --> 01:21:20,960
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1704
01:21:20,960 --> 01:21:23,280
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1705
01:21:23,280 --> 01:21:26,080
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1706
01:21:26,080 --> 01:21:28,239
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1707
01:21:28,239 --> 01:21:31,600
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1708
01:21:31,600 --> 01:21:34,000
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1709
01:21:34,000 --> 01:21:36,719
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1710
01:21:36,719 --> 01:21:40,239
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1711
01:21:40,239 --> 01:21:43,280
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1712
01:21:43,280 --> 01:21:45,520
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
1713
01:21:45,520 --> 01:21:47,679
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1714
01:21:47,679 --> 01:21:50,400
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1715
01:21:50,400 --> 01:21:53,440
है। वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी
1716
01:21:53,440 --> 01:21:55,679
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1717
01:21:55,679 --> 01:21:58,560
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1718
01:21:58,560 --> 01:22:00,960
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1719
01:22:00,960 --> 01:22:03,360
हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का
1720
01:22:03,360 --> 01:22:06,080
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1721
01:22:06,080 --> 01:22:09,920
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1722
01:22:09,920 --> 01:22:11,679
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1723
01:22:11,679 --> 01:22:14,800
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1724
01:22:14,800 --> 01:22:17,440
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1725
01:22:17,440 --> 01:22:19,840
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1726
01:22:19,840 --> 01:22:22,719
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
1727
01:22:22,719 --> 01:22:25,520
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है।
1728
01:22:25,520 --> 01:22:28,480
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
1729
01:22:28,480 --> 01:22:31,199
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
1730
01:22:31,199 --> 01:22:33,679
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
1731
01:22:33,679 --> 01:22:38,080
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1732
01:22:38,080 --> 01:22:40,480
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1733
01:22:40,480 --> 01:22:42,800
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1734
01:22:42,800 --> 01:22:45,600
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1735
01:22:45,600 --> 01:22:47,760
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1736
01:22:47,760 --> 01:22:51,120
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1737
01:22:51,120 --> 01:22:53,520
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1738
01:22:53,520 --> 01:22:56,320
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1739
01:22:56,320 --> 01:22:59,840
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1740
01:22:59,840 --> 01:23:02,880
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1741
01:23:02,880 --> 01:23:05,120
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1742
01:23:05,120 --> 01:23:07,280
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1743
01:23:07,280 --> 01:23:10,000
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1744
01:23:10,000 --> 01:23:12,480
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
1745
01:23:12,480 --> 01:23:14,960
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
1746
01:23:14,960 --> 01:23:17,360
ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है
1747
01:23:17,360 --> 01:23:19,920
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
1748
01:23:19,920 --> 01:23:22,239
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
1749
01:23:22,239 --> 01:23:25,120
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
1750
01:23:25,120 --> 01:23:28,719
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
1751
01:23:28,719 --> 01:23:31,040
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
1752
01:23:31,040 --> 01:23:33,760
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
1753
01:23:33,760 --> 01:23:36,320
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
1754
01:23:36,320 --> 01:23:38,880
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
1755
01:23:38,880 --> 01:23:41,199
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
1756
01:23:41,199 --> 01:23:43,920
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
1757
01:23:43,920 --> 01:23:46,880
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
1758
01:23:46,880 --> 01:23:49,440
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
1759
01:23:49,440 --> 01:23:52,000
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
1760
01:23:52,000 --> 01:23:55,360
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
1761
01:23:55,360 --> 01:23:57,760
नाम नहीं बनाता।
1762
01:23:57,760 --> 01:24:00,159
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1763
01:24:00,159 --> 01:24:02,480
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1764
01:24:02,480 --> 01:24:05,280
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1765
01:24:05,280 --> 01:24:07,440
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1766
01:24:07,440 --> 01:24:10,800
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1767
01:24:10,800 --> 01:24:13,199
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1768
01:24:13,199 --> 01:24:15,920
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1769
01:24:15,920 --> 01:24:19,440
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1770
01:24:19,440 --> 01:24:22,480
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1771
01:24:22,480 --> 01:24:24,719
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1772
01:24:24,719 --> 01:24:26,880
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1773
01:24:26,880 --> 01:24:29,600
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1774
01:24:29,600 --> 01:24:32,080
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
1775
01:24:32,080 --> 01:24:34,560
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
1776
01:24:34,560 --> 01:24:36,960
ड्रामा सेल के हवाले से वहीं रह जाती है
1777
01:24:36,960 --> 01:24:39,440
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
1778
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आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
1779
01:24:41,760 --> 01:24:44,639
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
1780
01:24:44,639 --> 01:24:48,320
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
1781
01:24:48,320 --> 01:24:50,639
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
1782
01:24:50,639 --> 01:24:53,360
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
1783
01:24:53,360 --> 01:24:55,920
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
1784
01:24:55,920 --> 01:24:58,480
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
1785
01:24:58,480 --> 01:25:00,800
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
1786
01:25:00,800 --> 01:25:03,520
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
1787
01:25:03,520 --> 01:25:06,480
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
1788
01:25:06,480 --> 01:25:09,040
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
1789
01:25:09,040 --> 01:25:11,600
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
1790
01:25:11,600 --> 01:25:14,960
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
1791
01:25:14,960 --> 01:25:17,360
नाम नहीं बनाता।
1792
01:25:17,360 --> 01:25:19,760
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1793
01:25:19,760 --> 01:25:22,080
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1794
01:25:22,080 --> 01:25:24,880
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1795
01:25:24,880 --> 01:25:27,040
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1796
01:25:27,040 --> 01:25:30,320
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1797
01:25:30,320 --> 01:25:32,800
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1798
01:25:32,800 --> 01:25:35,520
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1799
01:25:35,520 --> 01:25:39,040
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1800
01:25:39,040 --> 01:25:42,080
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1801
01:25:42,080 --> 01:25:44,320
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1802
01:25:44,320 --> 01:25:46,480
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1803
01:25:46,480 --> 01:25:49,199
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1804
01:25:49,199 --> 01:25:51,679
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
1805
01:25:51,679 --> 01:25:54,159
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
1806
01:25:54,159 --> 01:25:56,560
ड्रामा सेल के हवाले से वहीं रह जाती है
1807
01:25:56,560 --> 01:25:59,120
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
1808
01:25:59,120 --> 01:26:01,440
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
1809
01:26:01,440 --> 01:26:04,320
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
1810
01:26:04,320 --> 01:26:07,920
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
1811
01:26:07,920 --> 01:26:10,239
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
1812
01:26:10,239 --> 01:26:12,960
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
1813
01:26:12,960 --> 01:26:15,520
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
1814
01:26:15,520 --> 01:26:18,080
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
1815
01:26:18,080 --> 01:26:20,400
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
1816
01:26:20,400 --> 01:26:23,120
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मनसूर
1817
01:26:23,120 --> 01:26:26,080
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
1818
01:26:26,080 --> 01:26:28,639
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
1819
01:26:28,639 --> 01:26:31,199
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
1820
01:26:31,199 --> 01:26:34,560
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
1821
01:26:34,560 --> 01:26:36,960
नाम नहीं बनाता।
1822
01:26:36,960 --> 01:26:39,360
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1823
01:26:39,360 --> 01:26:41,679
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1824
01:26:41,679 --> 01:26:44,480
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1825
01:26:44,480 --> 01:26:46,639
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1826
01:26:46,639 --> 01:26:49,920
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1827
01:26:49,920 --> 01:26:52,400
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1828
01:26:52,400 --> 01:26:55,040
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1829
01:26:55,040 --> 01:26:58,560
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1830
01:26:58,560 --> 01:27:01,600
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1831
01:27:01,600 --> 01:27:03,840
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1832
01:27:03,840 --> 01:27:06,000
हंठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के
1833
01:27:06,000 --> 01:27:08,719
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1834
01:27:08,719 --> 01:27:12,080
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
1835
01:27:12,080 --> 01:27:14,320
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1836
01:27:14,320 --> 01:27:17,360
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
1837
01:27:17,360 --> 01:27:19,520
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1838
01:27:19,520 --> 01:27:22,000
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
1839
01:27:22,000 --> 01:27:24,800
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1840
01:27:24,800 --> 01:27:28,400
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1841
01:27:28,400 --> 01:27:30,639
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1842
01:27:30,639 --> 01:27:33,360
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1843
01:27:33,360 --> 01:27:36,239
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1844
01:27:36,239 --> 01:27:38,560
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1845
01:27:38,560 --> 01:27:41,280
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से अब
1846
01:27:41,280 --> 01:27:44,239
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर
1847
01:27:44,239 --> 01:27:47,040
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1848
01:27:47,040 --> 01:27:50,000
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1849
01:27:50,000 --> 01:27:52,400
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1850
01:27:52,400 --> 01:27:56,560
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1851
01:27:56,560 --> 01:27:58,960
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1852
01:27:58,960 --> 01:28:01,280
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1853
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है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1854
01:28:04,080 --> 01:28:06,239
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1855
01:28:06,239 --> 01:28:09,520
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1856
01:28:09,520 --> 01:28:12,000
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1857
01:28:12,000 --> 01:28:14,719
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1858
01:28:14,719 --> 01:28:18,239
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1859
01:28:18,239 --> 01:28:21,280
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1860
01:28:21,280 --> 01:28:23,520
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1861
01:28:23,520 --> 01:28:25,679
होठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के
1862
01:28:25,679 --> 01:28:28,400
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1863
01:28:28,400 --> 01:28:31,760
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
1864
01:28:31,760 --> 01:28:34,000
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1865
01:28:34,000 --> 01:28:36,960
हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी।
1866
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यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1867
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जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
1868
01:28:41,600 --> 01:28:44,400
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1869
01:28:44,400 --> 01:28:48,000
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1870
01:28:48,000 --> 01:28:50,239
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1871
01:28:50,239 --> 01:28:52,960
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1872
01:28:52,960 --> 01:28:55,760
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1873
01:28:55,760 --> 01:28:58,159
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1874
01:28:58,159 --> 01:29:00,880
कहती है कि बात गलतियां सजा नहीं से अब
1875
01:29:00,880 --> 01:29:03,840
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर
1876
01:29:03,840 --> 01:29:06,639
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1877
01:29:06,639 --> 01:29:09,600
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1878
01:29:09,600 --> 01:29:12,000
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1879
01:29:12,000 --> 01:29:16,159
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1880
01:29:16,159 --> 01:29:18,560
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1881
01:29:18,560 --> 01:29:20,880
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1882
01:29:20,880 --> 01:29:23,679
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1883
01:29:23,679 --> 01:29:25,840
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1884
01:29:25,840 --> 01:29:29,120
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1885
01:29:29,120 --> 01:29:31,600
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1886
01:29:31,600 --> 01:29:34,320
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1887
01:29:34,320 --> 01:29:37,840
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1888
01:29:37,840 --> 01:29:40,880
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1889
01:29:40,880 --> 01:29:43,120
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1890
01:29:43,120 --> 01:29:45,280
होठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के
1891
01:29:45,280 --> 01:29:48,000
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1892
01:29:48,000 --> 01:29:51,040
है। वो वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी
1893
01:29:51,040 --> 01:29:53,280
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1894
01:29:53,280 --> 01:29:56,159
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1895
01:29:56,159 --> 01:29:58,560
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1896
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हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का
1897
01:30:00,960 --> 01:30:03,679
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1898
01:30:03,679 --> 01:30:07,520
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1899
01:30:07,520 --> 01:30:09,280
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1900
01:30:09,280 --> 01:30:12,320
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1901
01:30:12,320 --> 01:30:15,040
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1902
01:30:15,040 --> 01:30:17,440
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1903
01:30:17,440 --> 01:30:20,320
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
1904
01:30:20,320 --> 01:30:23,120
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है।
1905
01:30:23,120 --> 01:30:26,080
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
1906
01:30:26,080 --> 01:30:28,800
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
1907
01:30:28,800 --> 01:30:31,280
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
1908
01:30:31,280 --> 01:30:35,760
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1909
01:30:35,760 --> 01:30:38,159
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1910
01:30:38,159 --> 01:30:40,480
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1911
01:30:40,480 --> 01:30:43,280
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1912
01:30:43,280 --> 01:30:45,440
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1913
01:30:45,440 --> 01:30:48,719
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1914
01:30:48,719 --> 01:30:51,199
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
1915
01:30:51,199 --> 01:30:53,920
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1916
01:30:53,920 --> 01:30:57,440
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1917
01:30:57,440 --> 01:31:00,480
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1918
01:31:00,480 --> 01:31:02,719
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1919
01:31:02,719 --> 01:31:04,880
होठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के
1920
01:31:04,880 --> 01:31:07,520
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
1921
01:31:07,520 --> 01:31:10,639
है। वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी
1922
01:31:10,639 --> 01:31:12,880
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
1923
01:31:12,880 --> 01:31:15,760
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
1924
01:31:15,760 --> 01:31:18,159
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
1925
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हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का
1926
01:31:20,560 --> 01:31:23,280
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
1927
01:31:23,280 --> 01:31:27,120
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
1928
01:31:27,120 --> 01:31:28,880
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
1929
01:31:28,880 --> 01:31:31,920
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
1930
01:31:31,920 --> 01:31:34,639
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
1931
01:31:34,639 --> 01:31:37,040
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
1932
01:31:37,040 --> 01:31:39,600
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
1933
01:31:39,600 --> 01:31:42,400
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
1934
01:31:42,400 --> 01:31:45,440
है। मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने
1935
01:31:45,440 --> 01:31:48,239
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
1936
01:31:48,239 --> 01:31:50,480
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
1937
01:31:50,480 --> 01:31:55,360
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1938
01:31:55,360 --> 01:31:57,679
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1939
01:31:57,679 --> 01:32:00,080
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1940
01:32:00,080 --> 01:32:02,880
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1941
01:32:02,880 --> 01:32:05,040
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1942
01:32:05,040 --> 01:32:08,320
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1943
01:32:08,320 --> 01:32:10,800
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1944
01:32:10,800 --> 01:32:13,520
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1945
01:32:13,520 --> 01:32:17,040
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1946
01:32:17,040 --> 01:32:20,080
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1947
01:32:20,080 --> 01:32:22,320
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
1948
01:32:22,320 --> 01:32:24,480
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1949
01:32:24,480 --> 01:32:27,520
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1950
01:32:27,520 --> 01:32:30,560
वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
1951
01:32:30,560 --> 01:32:32,800
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1952
01:32:32,800 --> 01:32:35,760
हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी।
1953
01:32:35,760 --> 01:32:37,920
यूसफु मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1954
01:32:37,920 --> 01:32:40,400
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
1955
01:32:40,400 --> 01:32:43,199
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1956
01:32:43,199 --> 01:32:46,800
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1957
01:32:46,800 --> 01:32:49,040
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1958
01:32:49,040 --> 01:32:51,760
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1959
01:32:51,760 --> 01:32:54,560
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1960
01:32:54,560 --> 01:32:56,960
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1961
01:32:56,960 --> 01:32:59,679
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब
1962
01:32:59,679 --> 01:33:02,639
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर
1963
01:33:02,639 --> 01:33:05,440
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1964
01:33:05,440 --> 01:33:08,400
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1965
01:33:08,400 --> 01:33:10,800
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1966
01:33:10,800 --> 01:33:14,960
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1967
01:33:14,960 --> 01:33:17,280
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1968
01:33:17,280 --> 01:33:19,679
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1969
01:33:19,679 --> 01:33:22,480
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1970
01:33:22,480 --> 01:33:24,639
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
1971
01:33:24,639 --> 01:33:27,920
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
1972
01:33:27,920 --> 01:33:30,400
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
1973
01:33:30,400 --> 01:33:33,120
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
1974
01:33:33,120 --> 01:33:36,639
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
1975
01:33:36,639 --> 01:33:39,679
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
1976
01:33:39,679 --> 01:33:41,920
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
1977
01:33:41,920 --> 01:33:44,080
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
1978
01:33:44,080 --> 01:33:47,120
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
1979
01:33:47,120 --> 01:33:50,400
वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद
1980
01:33:50,400 --> 01:33:52,400
की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
1981
01:33:52,400 --> 01:33:55,360
हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी।
1982
01:33:55,360 --> 01:33:57,520
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
1983
01:33:57,520 --> 01:34:00,000
जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
1984
01:34:00,000 --> 01:34:02,800
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
1985
01:34:02,800 --> 01:34:06,400
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
1986
01:34:06,400 --> 01:34:08,639
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
1987
01:34:08,639 --> 01:34:11,360
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
1988
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नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
1989
01:34:14,159 --> 01:34:16,560
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
1990
01:34:16,560 --> 01:34:19,280
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब
1991
01:34:19,280 --> 01:34:22,239
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर
1992
01:34:22,239 --> 01:34:25,040
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
1993
01:34:25,040 --> 01:34:28,000
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
1994
01:34:28,000 --> 01:34:30,400
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
1995
01:34:30,400 --> 01:34:34,560
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
1996
01:34:34,560 --> 01:34:36,880
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
1997
01:34:36,880 --> 01:34:39,280
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
1998
01:34:39,280 --> 01:34:42,000
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
1999
01:34:42,000 --> 01:34:44,239
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2000
01:34:44,239 --> 01:34:47,520
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2001
01:34:47,520 --> 01:34:49,920
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2002
01:34:49,920 --> 01:34:52,719
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2003
01:34:52,719 --> 01:34:56,159
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2004
01:34:56,159 --> 01:34:59,199
लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से
2005
01:34:59,199 --> 01:35:01,520
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2006
01:35:01,520 --> 01:35:03,679
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2007
01:35:03,679 --> 01:35:06,320
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2008
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है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
2009
01:35:09,760 --> 01:35:11,920
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
2010
01:35:11,920 --> 01:35:14,960
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
2011
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यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
2012
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जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता
2013
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चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
2014
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है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
2015
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2016
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की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
2017
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नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल
2018
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बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
2019
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कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
2020
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समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
2021
01:35:41,840 --> 01:35:44,639
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
2022
01:35:44,639 --> 01:35:47,520
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
2023
01:35:47,520 --> 01:35:50,000
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
2024
01:35:50,000 --> 01:35:54,159
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2025
01:35:54,159 --> 01:35:56,480
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2026
01:35:56,480 --> 01:35:58,880
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2027
01:35:58,880 --> 01:36:01,600
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2028
01:36:01,600 --> 01:36:03,840
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2029
01:36:03,840 --> 01:36:07,120
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2030
01:36:07,120 --> 01:36:09,520
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2031
01:36:09,520 --> 01:36:12,320
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2032
01:36:12,320 --> 01:36:15,760
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2033
01:36:15,760 --> 01:36:18,800
लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से
2034
01:36:18,800 --> 01:36:21,120
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2035
01:36:21,120 --> 01:36:23,280
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2036
01:36:23,280 --> 01:36:25,920
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2037
01:36:25,920 --> 01:36:29,280
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
2038
01:36:29,280 --> 01:36:31,520
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
2039
01:36:31,520 --> 01:36:34,560
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
2040
01:36:34,560 --> 01:36:36,719
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
2041
01:36:36,719 --> 01:36:39,199
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
2042
01:36:39,199 --> 01:36:41,920
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
2043
01:36:41,920 --> 01:36:45,600
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
2044
01:36:45,600 --> 01:36:47,760
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
2045
01:36:47,760 --> 01:36:50,560
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
2046
01:36:50,560 --> 01:36:53,360
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान फल
2047
01:36:53,360 --> 01:36:55,760
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
2048
01:36:55,760 --> 01:36:58,480
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
2049
01:36:58,480 --> 01:37:01,440
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
2050
01:37:01,440 --> 01:37:04,239
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
2051
01:37:04,239 --> 01:37:07,119
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
2052
01:37:07,119 --> 01:37:09,600
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
2053
01:37:09,600 --> 01:37:13,760
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2054
01:37:13,760 --> 01:37:16,080
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2055
01:37:16,080 --> 01:37:18,480
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2056
01:37:18,480 --> 01:37:21,199
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2057
01:37:21,199 --> 01:37:23,440
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2058
01:37:23,440 --> 01:37:26,719
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2059
01:37:26,719 --> 01:37:29,119
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2060
01:37:29,119 --> 01:37:31,920
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2061
01:37:31,920 --> 01:37:35,360
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2062
01:37:35,360 --> 01:37:38,400
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2063
01:37:38,400 --> 01:37:40,719
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2064
01:37:40,719 --> 01:37:42,880
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2065
01:37:42,880 --> 01:37:45,520
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2066
01:37:45,520 --> 01:37:48,560
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
2067
01:37:48,560 --> 01:37:50,880
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2068
01:37:50,880 --> 01:37:53,679
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2069
01:37:53,679 --> 01:37:56,159
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2070
01:37:56,159 --> 01:37:58,560
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2071
01:37:58,560 --> 01:38:01,280
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2072
01:38:01,280 --> 01:38:05,040
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2073
01:38:05,040 --> 01:38:06,880
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2074
01:38:06,880 --> 01:38:09,920
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2075
01:38:09,920 --> 01:38:12,560
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2076
01:38:12,560 --> 01:38:15,040
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2077
01:38:15,040 --> 01:38:17,600
मिलकर कहती है कि बाज गलतिया सजा नहीं
2078
01:38:17,600 --> 01:38:20,719
सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
2079
01:38:20,719 --> 01:38:23,440
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2080
01:38:23,440 --> 01:38:26,239
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2081
01:38:26,239 --> 01:38:28,480
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2082
01:38:28,480 --> 01:38:33,360
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2083
01:38:33,360 --> 01:38:35,679
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2084
01:38:35,679 --> 01:38:38,080
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2085
01:38:38,080 --> 01:38:40,800
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2086
01:38:40,800 --> 01:38:43,040
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2087
01:38:43,040 --> 01:38:46,320
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2088
01:38:46,320 --> 01:38:48,719
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2089
01:38:48,719 --> 01:38:51,520
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2090
01:38:51,520 --> 01:38:54,960
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2091
01:38:54,960 --> 01:38:58,000
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2092
01:38:58,000 --> 01:39:00,320
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2093
01:39:00,320 --> 01:39:02,480
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2094
01:39:02,480 --> 01:39:05,119
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2095
01:39:05,119 --> 01:39:08,159
है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
2096
01:39:08,159 --> 01:39:10,480
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2097
01:39:10,480 --> 01:39:13,280
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2098
01:39:13,280 --> 01:39:15,679
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2099
01:39:15,679 --> 01:39:18,159
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2100
01:39:18,159 --> 01:39:20,880
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2101
01:39:20,880 --> 01:39:24,639
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2102
01:39:24,639 --> 01:39:26,480
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2103
01:39:26,480 --> 01:39:29,520
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2104
01:39:29,520 --> 01:39:32,159
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2105
01:39:32,159 --> 01:39:34,639
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2106
01:39:34,639 --> 01:39:37,199
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
2107
01:39:37,199 --> 01:39:40,320
सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
2108
01:39:40,320 --> 01:39:43,040
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2109
01:39:43,040 --> 01:39:45,840
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2110
01:39:45,840 --> 01:39:48,080
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2111
01:39:48,080 --> 01:39:52,960
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2112
01:39:52,960 --> 01:39:55,280
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2113
01:39:55,280 --> 01:39:57,600
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2114
01:39:57,600 --> 01:40:00,400
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2115
01:40:00,400 --> 01:40:02,639
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2116
01:40:02,639 --> 01:40:05,920
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2117
01:40:05,920 --> 01:40:08,320
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2118
01:40:08,320 --> 01:40:11,119
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2119
01:40:11,119 --> 01:40:14,560
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2120
01:40:14,560 --> 01:40:17,600
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2121
01:40:17,600 --> 01:40:19,920
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2122
01:40:19,920 --> 01:40:22,080
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2123
01:40:22,080 --> 01:40:24,719
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2124
01:40:24,719 --> 01:40:27,760
है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
2125
01:40:27,760 --> 01:40:30,000
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2126
01:40:30,000 --> 01:40:32,880
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2127
01:40:32,880 --> 01:40:35,280
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2128
01:40:35,280 --> 01:40:37,760
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2129
01:40:37,760 --> 01:40:40,480
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2130
01:40:40,480 --> 01:40:44,239
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2131
01:40:44,239 --> 01:40:46,080
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2132
01:40:46,080 --> 01:40:49,119
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2133
01:40:49,119 --> 01:40:51,760
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2134
01:40:51,760 --> 01:40:54,239
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2135
01:40:54,239 --> 01:40:56,800
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
2136
01:40:56,800 --> 01:40:59,520
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
2137
01:40:59,520 --> 01:41:02,639
है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2138
01:41:02,639 --> 01:41:05,440
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2139
01:41:05,440 --> 01:41:07,679
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2140
01:41:07,679 --> 01:41:12,560
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2141
01:41:12,560 --> 01:41:14,880
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2142
01:41:14,880 --> 01:41:17,199
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2143
01:41:17,199 --> 01:41:20,000
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2144
01:41:20,000 --> 01:41:22,239
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2145
01:41:22,239 --> 01:41:25,520
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2146
01:41:25,520 --> 01:41:27,920
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2147
01:41:27,920 --> 01:41:30,639
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2148
01:41:30,639 --> 01:41:34,159
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2149
01:41:34,159 --> 01:41:37,199
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2150
01:41:37,199 --> 01:41:39,440
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
2151
01:41:39,440 --> 01:41:41,600
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2152
01:41:41,600 --> 01:41:44,320
इख्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2153
01:41:44,320 --> 01:41:47,360
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
2154
01:41:47,360 --> 01:41:49,600
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2155
01:41:49,600 --> 01:41:52,480
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2156
01:41:52,480 --> 01:41:54,880
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2157
01:41:54,880 --> 01:41:57,280
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2158
01:41:57,280 --> 01:42:00,000
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2159
01:42:00,000 --> 01:42:03,840
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2160
01:42:03,840 --> 01:42:05,600
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2161
01:42:05,600 --> 01:42:08,719
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2162
01:42:08,719 --> 01:42:11,360
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2163
01:42:11,360 --> 01:42:13,760
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2164
01:42:13,760 --> 01:42:16,639
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
2165
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अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है।
2166
01:42:19,440 --> 01:42:22,400
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
2167
01:42:22,400 --> 01:42:25,119
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
2168
01:42:25,119 --> 01:42:27,600
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
2169
01:42:27,600 --> 01:42:32,080
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2170
01:42:32,080 --> 01:42:34,480
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
2171
01:42:34,480 --> 01:42:36,800
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2172
01:42:36,800 --> 01:42:39,600
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2173
01:42:39,600 --> 01:42:41,760
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2174
01:42:41,760 --> 01:42:45,040
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2175
01:42:45,040 --> 01:42:47,440
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2176
01:42:47,440 --> 01:42:50,239
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2177
01:42:50,239 --> 01:42:53,679
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2178
01:42:53,679 --> 01:42:56,719
लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से
2179
01:42:56,719 --> 01:42:59,040
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2180
01:42:59,040 --> 01:43:01,199
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2181
01:43:01,199 --> 01:43:03,840
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2182
01:43:03,840 --> 01:43:07,199
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
2183
01:43:07,199 --> 01:43:09,440
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
2184
01:43:09,440 --> 01:43:12,480
हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी।
2185
01:43:12,480 --> 01:43:14,639
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
2186
01:43:14,639 --> 01:43:17,119
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
2187
01:43:17,119 --> 01:43:19,840
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
2188
01:43:19,840 --> 01:43:23,520
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
2189
01:43:23,520 --> 01:43:25,679
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
2190
01:43:25,679 --> 01:43:28,480
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
2191
01:43:28,480 --> 01:43:31,280
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान फल
2192
01:43:31,280 --> 01:43:33,679
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
2193
01:43:33,679 --> 01:43:36,400
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
2194
01:43:36,400 --> 01:43:39,360
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
2195
01:43:39,360 --> 01:43:42,159
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
2196
01:43:42,159 --> 01:43:45,040
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
2197
01:43:45,040 --> 01:43:47,520
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
2198
01:43:47,520 --> 01:43:51,679
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2199
01:43:51,679 --> 01:43:54,000
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2200
01:43:54,000 --> 01:43:56,400
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2201
01:43:56,400 --> 01:43:59,119
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2202
01:43:59,119 --> 01:44:01,360
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2203
01:44:01,360 --> 01:44:04,639
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2204
01:44:04,639 --> 01:44:07,040
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2205
01:44:07,040 --> 01:44:09,840
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2206
01:44:09,840 --> 01:44:13,280
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2207
01:44:13,280 --> 01:44:16,320
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2208
01:44:16,320 --> 01:44:18,639
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2209
01:44:18,639 --> 01:44:20,800
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2210
01:44:20,800 --> 01:44:23,440
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2211
01:44:23,440 --> 01:44:26,800
है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान
2212
01:44:26,800 --> 01:44:29,040
खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के
2213
01:44:29,040 --> 01:44:32,080
हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी।
2214
01:44:32,080 --> 01:44:34,239
यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो
2215
01:44:34,239 --> 01:44:36,719
जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता
2216
01:44:36,719 --> 01:44:39,440
चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता
2217
01:44:39,440 --> 01:44:43,119
है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को
2218
01:44:43,119 --> 01:44:45,280
मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर
2219
01:44:45,280 --> 01:44:48,080
की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी
2220
01:44:48,080 --> 01:44:50,880
नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान फल
2221
01:44:50,880 --> 01:44:53,280
बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर
2222
01:44:53,280 --> 01:44:56,000
कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ
2223
01:44:56,000 --> 01:44:58,960
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
2224
01:44:58,960 --> 01:45:01,760
अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के
2225
01:45:01,760 --> 01:45:04,639
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
2226
01:45:04,639 --> 01:45:07,119
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
2227
01:45:07,119 --> 01:45:11,280
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2228
01:45:11,280 --> 01:45:13,600
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2229
01:45:13,600 --> 01:45:16,000
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2230
01:45:16,000 --> 01:45:18,719
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2231
01:45:18,719 --> 01:45:20,960
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2232
01:45:20,960 --> 01:45:24,239
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2233
01:45:24,239 --> 01:45:26,639
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2234
01:45:26,639 --> 01:45:29,440
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2235
01:45:29,440 --> 01:45:32,880
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2236
01:45:32,880 --> 01:45:35,920
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2237
01:45:35,920 --> 01:45:38,239
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2238
01:45:38,239 --> 01:45:40,400
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2239
01:45:40,400 --> 01:45:43,040
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2240
01:45:43,040 --> 01:45:46,080
है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
2241
01:45:46,080 --> 01:45:48,400
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2242
01:45:48,400 --> 01:45:51,199
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2243
01:45:51,199 --> 01:45:53,600
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2244
01:45:53,600 --> 01:45:56,080
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2245
01:45:56,080 --> 01:45:58,800
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2246
01:45:58,800 --> 01:46:02,560
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2247
01:46:02,560 --> 01:46:04,400
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2248
01:46:04,400 --> 01:46:07,440
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2249
01:46:07,440 --> 01:46:10,080
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2250
01:46:10,080 --> 01:46:12,560
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2251
01:46:12,560 --> 01:46:15,119
मिलकर कहती है कि बाज गलतिया सजा नहीं
2252
01:46:15,119 --> 01:46:18,239
सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
2253
01:46:18,239 --> 01:46:20,960
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2254
01:46:20,960 --> 01:46:23,760
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2255
01:46:23,760 --> 01:46:26,000
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2256
01:46:26,000 --> 01:46:30,880
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2257
01:46:30,880 --> 01:46:33,199
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2258
01:46:33,199 --> 01:46:35,520
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2259
01:46:35,520 --> 01:46:38,320
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2260
01:46:38,320 --> 01:46:40,560
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2261
01:46:40,560 --> 01:46:43,840
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2262
01:46:43,840 --> 01:46:46,239
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2263
01:46:46,239 --> 01:46:49,040
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2264
01:46:49,040 --> 01:46:52,480
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2265
01:46:52,480 --> 01:46:55,520
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2266
01:46:55,520 --> 01:46:57,840
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2267
01:46:57,840 --> 01:47:00,000
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2268
01:47:00,000 --> 01:47:02,639
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2269
01:47:02,639 --> 01:47:05,679
है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
2270
01:47:05,679 --> 01:47:08,000
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2271
01:47:08,000 --> 01:47:10,800
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2272
01:47:10,800 --> 01:47:13,199
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2273
01:47:13,199 --> 01:47:15,679
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2274
01:47:15,679 --> 01:47:18,400
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2275
01:47:18,400 --> 01:47:22,159
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2276
01:47:22,159 --> 01:47:24,000
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2277
01:47:24,000 --> 01:47:27,040
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2278
01:47:27,040 --> 01:47:29,679
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2279
01:47:29,679 --> 01:47:32,159
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2280
01:47:32,159 --> 01:47:34,719
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
2281
01:47:34,719 --> 01:47:37,440
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
2282
01:47:37,440 --> 01:47:40,560
है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2283
01:47:40,560 --> 01:47:43,360
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2284
01:47:43,360 --> 01:47:45,600
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2285
01:47:45,600 --> 01:47:50,480
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2286
01:47:50,480 --> 01:47:52,800
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2287
01:47:52,800 --> 01:47:55,119
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2288
01:47:55,119 --> 01:47:57,920
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2289
01:47:57,920 --> 01:48:00,159
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2290
01:48:00,159 --> 01:48:03,440
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2291
01:48:03,440 --> 01:48:05,840
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2292
01:48:05,840 --> 01:48:08,639
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2293
01:48:08,639 --> 01:48:12,080
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2294
01:48:12,080 --> 01:48:15,119
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2295
01:48:15,119 --> 01:48:17,440
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2296
01:48:17,440 --> 01:48:19,600
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2297
01:48:19,600 --> 01:48:22,239
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2298
01:48:22,239 --> 01:48:25,280
है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
2299
01:48:25,280 --> 01:48:27,520
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2300
01:48:27,520 --> 01:48:30,400
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2301
01:48:30,400 --> 01:48:32,800
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2302
01:48:32,800 --> 01:48:35,199
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2303
01:48:35,199 --> 01:48:38,000
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2304
01:48:38,000 --> 01:48:41,760
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2305
01:48:41,760 --> 01:48:43,600
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2306
01:48:43,600 --> 01:48:46,639
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2307
01:48:46,639 --> 01:48:49,280
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2308
01:48:49,280 --> 01:48:51,760
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2309
01:48:51,760 --> 01:48:54,320
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
2310
01:48:54,320 --> 01:48:57,440
सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
2311
01:48:57,440 --> 01:49:00,159
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2312
01:49:00,159 --> 01:49:02,880
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2313
01:49:02,880 --> 01:49:05,199
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2314
01:49:05,199 --> 01:49:10,080
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2315
01:49:10,080 --> 01:49:12,400
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2316
01:49:12,400 --> 01:49:14,719
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2317
01:49:14,719 --> 01:49:17,520
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2318
01:49:17,520 --> 01:49:19,760
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2319
01:49:19,760 --> 01:49:23,040
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2320
01:49:23,040 --> 01:49:25,440
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2321
01:49:25,440 --> 01:49:28,159
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2322
01:49:28,159 --> 01:49:31,679
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2323
01:49:31,679 --> 01:49:34,719
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2324
01:49:34,719 --> 01:49:37,040
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2325
01:49:37,040 --> 01:49:39,199
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2326
01:49:39,199 --> 01:49:41,840
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2327
01:49:41,840 --> 01:49:44,880
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
2328
01:49:44,880 --> 01:49:47,119
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2329
01:49:47,119 --> 01:49:50,000
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2330
01:49:50,000 --> 01:49:52,400
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2331
01:49:52,400 --> 01:49:54,800
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2332
01:49:54,800 --> 01:49:57,600
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2333
01:49:57,600 --> 01:50:01,360
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2334
01:50:01,360 --> 01:50:03,199
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2335
01:50:03,199 --> 01:50:06,239
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2336
01:50:06,239 --> 01:50:08,880
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2337
01:50:08,880 --> 01:50:11,360
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2338
01:50:11,360 --> 01:50:13,920
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
2339
01:50:13,920 --> 01:50:16,639
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
2340
01:50:16,639 --> 01:50:19,760
है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2341
01:50:19,760 --> 01:50:22,480
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2342
01:50:22,480 --> 01:50:24,800
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2343
01:50:24,800 --> 01:50:29,679
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2344
01:50:29,679 --> 01:50:32,000
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2345
01:50:32,000 --> 01:50:34,320
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2346
01:50:34,320 --> 01:50:37,119
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2347
01:50:37,119 --> 01:50:39,360
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2348
01:50:39,360 --> 01:50:42,639
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2349
01:50:42,639 --> 01:50:45,040
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2350
01:50:45,040 --> 01:50:47,760
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2351
01:50:47,760 --> 01:50:51,280
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2352
01:50:51,280 --> 01:50:54,320
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2353
01:50:54,320 --> 01:50:56,639
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2354
01:50:56,639 --> 01:50:58,800
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2355
01:50:58,800 --> 01:51:01,440
इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2356
01:51:01,440 --> 01:51:04,480
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
2357
01:51:04,480 --> 01:51:06,719
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2358
01:51:06,719 --> 01:51:09,600
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2359
01:51:09,600 --> 01:51:12,000
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2360
01:51:12,000 --> 01:51:14,400
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2361
01:51:14,400 --> 01:51:17,199
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2362
01:51:17,199 --> 01:51:20,960
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2363
01:51:20,960 --> 01:51:22,800
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2364
01:51:22,800 --> 01:51:25,840
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2365
01:51:25,840 --> 01:51:28,480
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2366
01:51:28,480 --> 01:51:30,960
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2367
01:51:30,960 --> 01:51:33,520
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
2368
01:51:33,520 --> 01:51:36,239
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
2369
01:51:36,239 --> 01:51:39,360
है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2370
01:51:39,360 --> 01:51:42,080
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2371
01:51:42,080 --> 01:51:44,400
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2372
01:51:44,400 --> 01:51:49,280
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2373
01:51:49,280 --> 01:51:51,599
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2374
01:51:51,599 --> 01:51:53,920
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2375
01:51:53,920 --> 01:51:56,719
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2376
01:51:56,719 --> 01:51:58,960
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2377
01:51:58,960 --> 01:52:02,239
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2378
01:52:02,239 --> 01:52:04,639
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2379
01:52:04,639 --> 01:52:07,360
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2380
01:52:07,360 --> 01:52:10,880
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2381
01:52:10,880 --> 01:52:13,920
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2382
01:52:13,920 --> 01:52:16,239
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2383
01:52:16,239 --> 01:52:18,400
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2384
01:52:18,400 --> 01:52:21,040
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2385
01:52:21,040 --> 01:52:24,080
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
2386
01:52:24,080 --> 01:52:26,320
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2387
01:52:26,320 --> 01:52:29,199
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2388
01:52:29,199 --> 01:52:31,599
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2389
01:52:31,599 --> 01:52:34,000
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2390
01:52:34,000 --> 01:52:36,800
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2391
01:52:36,800 --> 01:52:40,560
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2392
01:52:40,560 --> 01:52:42,400
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2393
01:52:42,400 --> 01:52:45,440
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2394
01:52:45,440 --> 01:52:48,080
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2395
01:52:48,080 --> 01:52:50,560
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2396
01:52:50,560 --> 01:52:53,119
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं
2397
01:52:53,119 --> 01:52:55,840
सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता
2398
01:52:55,840 --> 01:52:58,960
है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2399
01:52:58,960 --> 01:53:01,679
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2400
01:53:01,679 --> 01:53:04,000
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2401
01:53:04,000 --> 01:53:08,880
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2402
01:53:08,880 --> 01:53:11,199
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2403
01:53:11,199 --> 01:53:13,520
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2404
01:53:13,520 --> 01:53:16,320
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2405
01:53:16,320 --> 01:53:18,560
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2406
01:53:18,560 --> 01:53:21,840
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2407
01:53:21,840 --> 01:53:24,239
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2408
01:53:24,239 --> 01:53:26,960
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2409
01:53:26,960 --> 01:53:30,480
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2410
01:53:30,480 --> 01:53:33,520
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2411
01:53:33,520 --> 01:53:35,840
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2412
01:53:35,840 --> 01:53:38,000
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2413
01:53:38,000 --> 01:53:40,639
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2414
01:53:40,639 --> 01:53:43,679
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
2415
01:53:43,679 --> 01:53:45,920
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2416
01:53:45,920 --> 01:53:48,800
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2417
01:53:48,800 --> 01:53:51,199
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2418
01:53:51,199 --> 01:53:53,599
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2419
01:53:53,599 --> 01:53:56,400
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2420
01:53:56,400 --> 01:54:00,159
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2421
01:54:00,159 --> 01:54:02,000
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2422
01:54:02,000 --> 01:54:05,040
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2423
01:54:05,040 --> 01:54:07,679
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2424
01:54:07,679 --> 01:54:10,159
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2425
01:54:10,159 --> 01:54:12,960
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
2426
01:54:12,960 --> 01:54:15,840
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
2427
01:54:15,840 --> 01:54:18,560
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2428
01:54:18,560 --> 01:54:21,280
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2429
01:54:21,280 --> 01:54:23,599
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2430
01:54:23,599 --> 01:54:28,480
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2431
01:54:28,480 --> 01:54:30,800
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2432
01:54:30,800 --> 01:54:33,119
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2433
01:54:33,119 --> 01:54:35,920
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2434
01:54:35,920 --> 01:54:38,159
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2435
01:54:38,159 --> 01:54:41,440
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2436
01:54:41,440 --> 01:54:43,840
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर
2437
01:54:43,840 --> 01:54:46,560
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2438
01:54:46,560 --> 01:54:50,080
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2439
01:54:50,080 --> 01:54:53,119
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2440
01:54:53,119 --> 01:54:55,440
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2441
01:54:55,440 --> 01:54:57,599
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2442
01:54:57,599 --> 01:55:00,639
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
2443
01:55:00,639 --> 01:55:03,280
वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
2444
01:55:03,280 --> 01:55:05,520
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2445
01:55:05,520 --> 01:55:08,400
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2446
01:55:08,400 --> 01:55:10,800
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2447
01:55:10,800 --> 01:55:13,199
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2448
01:55:13,199 --> 01:55:16,000
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2449
01:55:16,000 --> 01:55:19,760
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2450
01:55:19,760 --> 01:55:21,599
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2451
01:55:21,599 --> 01:55:24,639
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2452
01:55:24,639 --> 01:55:27,280
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2453
01:55:27,280 --> 01:55:29,679
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2454
01:55:29,679 --> 01:55:32,560
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
2455
01:55:32,560 --> 01:55:35,360
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
2456
01:55:35,360 --> 01:55:38,159
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने
2457
01:55:38,159 --> 01:55:40,880
बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर
2458
01:55:40,880 --> 01:55:43,199
पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए
2459
01:55:43,199 --> 01:55:48,000
कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2460
01:55:48,000 --> 01:55:50,400
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2461
01:55:50,400 --> 01:55:52,719
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2462
01:55:52,719 --> 01:55:55,520
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2463
01:55:55,520 --> 01:55:57,760
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2464
01:55:57,760 --> 01:56:01,040
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2465
01:56:01,040 --> 01:56:03,440
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2466
01:56:03,440 --> 01:56:06,159
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2467
01:56:06,159 --> 01:56:09,679
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2468
01:56:09,679 --> 01:56:12,719
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2469
01:56:12,719 --> 01:56:15,040
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2470
01:56:15,040 --> 01:56:17,199
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2471
01:56:17,199 --> 01:56:20,239
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
2472
01:56:20,239 --> 01:56:22,880
वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
2473
01:56:22,880 --> 01:56:25,119
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2474
01:56:25,119 --> 01:56:28,000
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2475
01:56:28,000 --> 01:56:30,400
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2476
01:56:30,400 --> 01:56:32,800
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2477
01:56:32,800 --> 01:56:35,599
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2478
01:56:35,599 --> 01:56:39,360
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2479
01:56:39,360 --> 01:56:41,199
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2480
01:56:41,199 --> 01:56:44,239
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2481
01:56:44,239 --> 01:56:46,880
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2482
01:56:46,880 --> 01:56:49,280
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2483
01:56:49,280 --> 01:56:52,159
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
2484
01:56:52,159 --> 01:56:54,960
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है
2485
01:56:54,960 --> 01:56:58,000
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
2486
01:56:58,000 --> 01:57:00,639
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
2487
01:57:00,639 --> 01:57:03,119
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
2488
01:57:03,119 --> 01:57:07,599
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2489
01:57:07,599 --> 01:57:10,000
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2490
01:57:10,000 --> 01:57:12,320
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2491
01:57:12,320 --> 01:57:15,119
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2492
01:57:15,119 --> 01:57:17,360
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2493
01:57:17,360 --> 01:57:20,639
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2494
01:57:20,639 --> 01:57:23,040
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2495
01:57:23,040 --> 01:57:25,760
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2496
01:57:25,760 --> 01:57:29,280
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2497
01:57:29,280 --> 01:57:32,320
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2498
01:57:32,320 --> 01:57:34,639
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2499
01:57:34,639 --> 01:57:36,800
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2500
01:57:36,800 --> 01:57:39,840
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
2501
01:57:39,840 --> 01:57:42,480
वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
2502
01:57:42,480 --> 01:57:44,719
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2503
01:57:44,719 --> 01:57:47,599
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2504
01:57:47,599 --> 01:57:50,000
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2505
01:57:50,000 --> 01:57:52,400
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2506
01:57:52,400 --> 01:57:55,199
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2507
01:57:55,199 --> 01:57:58,960
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2508
01:57:58,960 --> 01:58:00,800
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2509
01:58:00,800 --> 01:58:03,840
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2510
01:58:03,840 --> 01:58:06,480
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2511
01:58:06,480 --> 01:58:08,880
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2512
01:58:08,880 --> 01:58:12,000
मिलकर कहती है कि बाज गलत सजा नहीं से अब
2513
01:58:12,000 --> 01:58:14,960
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर
2514
01:58:14,960 --> 01:58:17,760
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
2515
01:58:17,760 --> 01:58:20,639
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
2516
01:58:20,639 --> 01:58:23,119
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
2517
01:58:23,119 --> 01:58:27,199
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2518
01:58:27,199 --> 01:58:29,599
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2519
01:58:29,599 --> 01:58:31,920
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2520
01:58:31,920 --> 01:58:34,719
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2521
01:58:34,719 --> 01:58:36,960
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2522
01:58:36,960 --> 01:58:40,239
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2523
01:58:40,239 --> 01:58:42,639
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2524
01:58:42,639 --> 01:58:45,360
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2525
01:58:45,360 --> 01:58:48,880
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2526
01:58:48,880 --> 01:58:51,920
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2527
01:58:51,920 --> 01:58:54,239
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2528
01:58:54,239 --> 01:58:56,400
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2529
01:58:56,400 --> 01:58:59,440
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
2530
01:58:59,440 --> 01:59:02,080
वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी
2531
01:59:02,080 --> 01:59:04,320
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2532
01:59:04,320 --> 01:59:07,199
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2533
01:59:07,199 --> 01:59:09,599
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2534
01:59:09,599 --> 01:59:12,000
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2535
01:59:12,000 --> 01:59:14,800
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2536
01:59:14,800 --> 01:59:18,560
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2537
01:59:18,560 --> 01:59:20,400
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2538
01:59:20,400 --> 01:59:23,440
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2539
01:59:23,440 --> 01:59:26,080
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2540
01:59:26,080 --> 01:59:28,480
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2541
01:59:28,480 --> 01:59:31,599
मिलकर कहती है कि बाज गलत सजा नहीं से अब
2542
01:59:31,599 --> 01:59:34,560
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर
2543
01:59:34,560 --> 01:59:37,360
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
2544
01:59:37,360 --> 01:59:40,239
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
2545
01:59:40,239 --> 01:59:42,719
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
2546
01:59:42,719 --> 01:59:46,800
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2547
01:59:46,800 --> 01:59:49,199
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2548
01:59:49,199 --> 01:59:51,520
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2549
01:59:51,520 --> 01:59:54,320
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2550
01:59:54,320 --> 01:59:56,560
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2551
01:59:56,560 --> 01:59:59,840
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2552
01:59:59,840 --> 02:00:02,239
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2553
02:00:02,239 --> 02:00:04,960
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2554
02:00:04,960 --> 02:00:08,480
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2555
02:00:08,480 --> 02:00:11,520
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2556
02:00:11,520 --> 02:00:13,840
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2557
02:00:13,840 --> 02:00:16,000
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2558
02:00:16,000 --> 02:00:18,800
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
2559
02:00:18,800 --> 02:00:21,679
वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी
2560
02:00:21,679 --> 02:00:23,920
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2561
02:00:23,920 --> 02:00:26,800
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2562
02:00:26,800 --> 02:00:29,199
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2563
02:00:29,199 --> 02:00:31,599
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2564
02:00:31,599 --> 02:00:34,400
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2565
02:00:34,400 --> 02:00:38,159
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2566
02:00:38,159 --> 02:00:39,920
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2567
02:00:39,920 --> 02:00:43,040
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2568
02:00:43,040 --> 02:00:45,679
भी नुकसान में है। अलिया दोनों के दरमियान
2569
02:00:45,679 --> 02:00:48,080
फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2570
02:00:48,080 --> 02:00:50,960
मिलकर कहती है कि बाज गलतिया सजा नहीं से
2571
02:00:50,960 --> 02:00:53,760
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है।
2572
02:00:53,760 --> 02:00:56,800
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
2573
02:00:56,800 --> 02:00:59,440
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
2574
02:00:59,440 --> 02:01:01,920
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
2575
02:01:01,920 --> 02:01:06,400
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2576
02:01:06,400 --> 02:01:08,800
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2577
02:01:08,800 --> 02:01:11,119
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2578
02:01:11,119 --> 02:01:13,920
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2579
02:01:13,920 --> 02:01:16,159
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2580
02:01:16,159 --> 02:01:19,440
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2581
02:01:19,440 --> 02:01:21,840
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2582
02:01:21,840 --> 02:01:24,560
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2583
02:01:24,560 --> 02:01:28,080
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2584
02:01:28,080 --> 02:01:31,119
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2585
02:01:31,119 --> 02:01:33,440
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2586
02:01:33,440 --> 02:01:35,599
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2587
02:01:35,599 --> 02:01:38,400
इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है।
2588
02:01:38,400 --> 02:01:41,280
वो वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
2589
02:01:41,280 --> 02:01:43,520
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2590
02:01:43,520 --> 02:01:46,400
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2591
02:01:46,400 --> 02:01:48,800
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2592
02:01:48,800 --> 02:01:51,199
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2593
02:01:51,199 --> 02:01:54,000
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2594
02:01:54,000 --> 02:01:57,760
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2595
02:01:57,760 --> 02:01:59,520
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2596
02:01:59,520 --> 02:02:02,639
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2597
02:02:02,639 --> 02:02:05,280
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2598
02:02:05,280 --> 02:02:07,679
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2599
02:02:07,679 --> 02:02:10,560
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
2600
02:02:10,560 --> 02:02:13,360
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है।
2601
02:02:13,360 --> 02:02:16,320
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
2602
02:02:16,320 --> 02:02:19,040
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
2603
02:02:19,040 --> 02:02:21,520
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
2604
02:02:21,520 --> 02:02:26,000
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2605
02:02:26,000 --> 02:02:28,400
मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर
2606
02:02:28,400 --> 02:02:30,719
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2607
02:02:30,719 --> 02:02:33,520
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2608
02:02:33,520 --> 02:02:35,760
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2609
02:02:35,760 --> 02:02:39,040
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2610
02:02:39,040 --> 02:02:41,440
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2611
02:02:41,440 --> 02:02:44,159
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2612
02:02:44,159 --> 02:02:47,679
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2613
02:02:47,679 --> 02:02:50,719
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2614
02:02:50,719 --> 02:02:52,960
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
2615
02:02:52,960 --> 02:02:55,119
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2616
02:02:55,119 --> 02:02:57,840
इख्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2617
02:02:57,840 --> 02:03:00,320
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
2618
02:03:00,320 --> 02:03:02,800
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
2619
02:03:02,800 --> 02:03:05,199
ड्रामा सेल के हवाले से वहीं रह जाती है
2620
02:03:05,199 --> 02:03:07,760
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
2621
02:03:07,760 --> 02:03:10,080
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की
2622
02:03:10,080 --> 02:03:12,960
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
2623
02:03:12,960 --> 02:03:16,560
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
2624
02:03:16,560 --> 02:03:18,880
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
2625
02:03:18,880 --> 02:03:21,679
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
2626
02:03:21,679 --> 02:03:24,159
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
2627
02:03:24,159 --> 02:03:26,719
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
2628
02:03:26,719 --> 02:03:29,040
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
2629
02:03:29,040 --> 02:03:31,840
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
2630
02:03:31,840 --> 02:03:34,719
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
2631
02:03:34,719 --> 02:03:37,280
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
2632
02:03:37,280 --> 02:03:39,920
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
2633
02:03:39,920 --> 02:03:43,199
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
2634
02:03:43,199 --> 02:03:45,599
नाम नहीं बनाता।
2635
02:03:45,599 --> 02:03:48,000
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
2636
02:03:48,000 --> 02:03:50,320
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2637
02:03:50,320 --> 02:03:53,119
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2638
02:03:53,119 --> 02:03:55,360
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2639
02:03:55,360 --> 02:03:58,639
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2640
02:03:58,639 --> 02:04:01,040
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2641
02:04:01,040 --> 02:04:03,760
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2642
02:04:03,760 --> 02:04:07,280
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2643
02:04:07,280 --> 02:04:10,320
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2644
02:04:10,320 --> 02:04:12,560
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
2645
02:04:12,560 --> 02:04:14,719
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2646
02:04:14,719 --> 02:04:17,440
इख्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2647
02:04:17,440 --> 02:04:20,480
है। वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी
2648
02:04:20,480 --> 02:04:22,719
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2649
02:04:22,719 --> 02:04:25,599
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2650
02:04:25,599 --> 02:04:28,000
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2651
02:04:28,000 --> 02:04:30,400
हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का
2652
02:04:30,400 --> 02:04:33,119
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2653
02:04:33,119 --> 02:04:36,960
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2654
02:04:36,960 --> 02:04:38,719
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2655
02:04:38,719 --> 02:04:41,840
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2656
02:04:41,840 --> 02:04:44,480
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2657
02:04:44,480 --> 02:04:46,880
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2658
02:04:46,880 --> 02:04:49,760
मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से
2659
02:04:49,760 --> 02:04:52,560
अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है।
2660
02:04:52,560 --> 02:04:55,520
मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप
2661
02:04:55,520 --> 02:04:58,239
के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर
2662
02:04:58,239 --> 02:05:00,719
मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज
2663
02:05:00,719 --> 02:05:05,199
अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2664
02:05:05,199 --> 02:05:07,599
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
2665
02:05:07,599 --> 02:05:09,920
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2666
02:05:09,920 --> 02:05:12,719
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2667
02:05:12,719 --> 02:05:14,960
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2668
02:05:14,960 --> 02:05:18,239
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2669
02:05:18,239 --> 02:05:20,639
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2670
02:05:20,639 --> 02:05:23,360
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2671
02:05:23,360 --> 02:05:26,880
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2672
02:05:26,880 --> 02:05:29,920
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2673
02:05:29,920 --> 02:05:32,159
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
2674
02:05:32,159 --> 02:05:34,320
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2675
02:05:34,320 --> 02:05:37,040
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2676
02:05:37,040 --> 02:05:40,080
है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
2677
02:05:40,080 --> 02:05:42,320
इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
2678
02:05:42,320 --> 02:05:45,199
सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी
2679
02:05:45,199 --> 02:05:47,599
थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम
2680
02:05:47,599 --> 02:05:50,000
हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का
2681
02:05:50,000 --> 02:05:52,719
पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर
2682
02:05:52,719 --> 02:05:56,560
देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ
2683
02:05:56,560 --> 02:05:58,320
को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद
2684
02:05:58,320 --> 02:06:01,440
मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार
2685
02:06:01,440 --> 02:06:04,080
भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान
2686
02:06:04,080 --> 02:06:06,480
पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से
2687
02:06:06,480 --> 02:06:09,520
मिलकर कहती है कि बाज गलत सजा नहीं से अब
2688
02:06:09,520 --> 02:06:12,560
समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर
2689
02:06:12,560 --> 02:06:15,280
अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के
2690
02:06:15,280 --> 02:06:18,239
कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद
2691
02:06:18,239 --> 02:06:20,639
करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा
2692
02:06:20,639 --> 02:06:24,800
कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता।
2693
02:06:24,800 --> 02:06:27,199
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
2694
02:06:27,199 --> 02:06:29,520
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2695
02:06:29,520 --> 02:06:32,320
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2696
02:06:32,320 --> 02:06:34,480
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2697
02:06:34,480 --> 02:06:37,840
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2698
02:06:37,840 --> 02:06:40,239
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2699
02:06:40,239 --> 02:06:42,960
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2700
02:06:42,960 --> 02:06:46,480
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2701
02:06:46,480 --> 02:06:49,520
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2702
02:06:49,520 --> 02:06:51,760
देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और
2703
02:06:51,760 --> 02:06:53,920
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2704
02:06:53,920 --> 02:06:56,639
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2705
02:06:56,639 --> 02:06:59,119
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
2706
02:06:59,119 --> 02:07:01,599
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
2707
02:07:01,599 --> 02:07:04,000
ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है
2708
02:07:04,000 --> 02:07:06,560
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
2709
02:07:06,560 --> 02:07:08,880
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
2710
02:07:08,880 --> 02:07:11,760
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
2711
02:07:11,760 --> 02:07:15,360
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
2712
02:07:15,360 --> 02:07:17,679
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
2713
02:07:17,679 --> 02:07:20,400
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
2714
02:07:20,400 --> 02:07:22,960
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
2715
02:07:22,960 --> 02:07:25,520
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
2716
02:07:25,520 --> 02:07:27,840
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
2717
02:07:27,840 --> 02:07:30,560
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
2718
02:07:30,560 --> 02:07:33,520
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
2719
02:07:33,520 --> 02:07:36,079
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
2720
02:07:36,079 --> 02:07:38,719
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
2721
02:07:38,719 --> 02:07:42,000
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
2722
02:07:42,000 --> 02:07:44,400
नाम नहीं बनाता।
2723
02:07:44,400 --> 02:07:46,800
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
2724
02:07:46,800 --> 02:07:49,119
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2725
02:07:49,119 --> 02:07:51,920
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2726
02:07:51,920 --> 02:07:54,079
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2727
02:07:54,079 --> 02:07:57,440
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2728
02:07:57,440 --> 02:07:59,840
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2729
02:07:59,840 --> 02:08:02,560
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2730
02:08:02,560 --> 02:08:06,079
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2731
02:08:06,079 --> 02:08:09,119
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2732
02:08:09,119 --> 02:08:11,360
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2733
02:08:11,360 --> 02:08:13,520
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2734
02:08:13,520 --> 02:08:16,239
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2735
02:08:16,239 --> 02:08:18,719
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
2736
02:08:18,719 --> 02:08:21,199
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
2737
02:08:21,199 --> 02:08:23,599
ड्रामा सेल के हवाले से वहीं रह जाती है
2738
02:08:23,599 --> 02:08:26,159
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
2739
02:08:26,159 --> 02:08:28,480
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
2740
02:08:28,480 --> 02:08:31,360
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
2741
02:08:31,360 --> 02:08:34,960
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
2742
02:08:34,960 --> 02:08:37,280
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
2743
02:08:37,280 --> 02:08:40,000
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
2744
02:08:40,000 --> 02:08:42,560
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
2745
02:08:42,560 --> 02:08:45,119
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
2746
02:08:45,119 --> 02:08:47,440
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
2747
02:08:47,440 --> 02:08:50,159
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
2748
02:08:50,159 --> 02:08:53,119
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
2749
02:08:53,119 --> 02:08:55,679
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
2750
02:08:55,679 --> 02:08:58,239
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
2751
02:08:58,239 --> 02:09:01,599
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
2752
02:09:01,599 --> 02:09:04,000
नाम नहीं बनाता।
2753
02:09:04,000 --> 02:09:06,400
मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
2754
02:09:06,400 --> 02:09:08,719
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2755
02:09:08,719 --> 02:09:11,520
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2756
02:09:11,520 --> 02:09:13,679
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2757
02:09:13,679 --> 02:09:16,960
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
2758
02:09:16,960 --> 02:09:19,440
रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
2759
02:09:19,440 --> 02:09:22,159
खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
2760
02:09:22,159 --> 02:09:25,679
मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
2761
02:09:25,679 --> 02:09:28,719
लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
2762
02:09:28,719 --> 02:09:30,960
देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
2763
02:09:30,960 --> 02:09:33,119
होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
2764
02:09:33,119 --> 02:09:35,840
इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
2765
02:09:35,840 --> 02:09:38,320
है। वो वापस इससे घर की नहीं होती।
2766
02:09:38,320 --> 02:09:40,800
कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है।
2767
02:09:40,800 --> 02:09:43,199
ड्रामा सेल के हवाले से वहीं रह जाती है
2768
02:09:43,199 --> 02:09:45,760
जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
2769
02:09:45,760 --> 02:09:48,079
आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
2770
02:09:48,079 --> 02:09:50,960
वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
2771
02:09:50,960 --> 02:09:54,560
इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
2772
02:09:54,560 --> 02:09:56,880
इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने
2773
02:09:56,880 --> 02:09:59,599
के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और
2774
02:09:59,599 --> 02:10:02,159
कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के
2775
02:10:02,159 --> 02:10:04,719
दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो
2776
02:10:04,719 --> 02:10:07,040
मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां
2777
02:10:07,040 --> 02:10:09,760
सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर
2778
02:10:09,760 --> 02:10:12,719
खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता
2779
02:10:12,719 --> 02:10:15,280
है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के
2780
02:10:15,280 --> 02:10:17,840
लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी
2781
02:10:17,840 --> 02:10:21,199
कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर
2782
02:10:21,199 --> 02:10:23,599
नाम नहीं बनाता।
2783
02:10:23,599 --> 02:10:26,000
मंजूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर
2784
02:10:26,000 --> 02:10:28,320
रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता
2785
02:10:28,320 --> 02:10:31,119
है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है।
2786
02:10:31,119 --> 02:10:33,280
दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की
2787
02:10:33,280 --> 02:10:36,560
खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर
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रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर
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खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और
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मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले
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लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से
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देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और
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होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के
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इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता
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है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी
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इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा
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सेल के हवाले से वहीं रह जाती है जहां
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टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर
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आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की
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वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से
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इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी।
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इधर यू सबको मालूम होता377118
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